अनुभूति -1 [2(6)] रौनक के घर शादी की चर्चा
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कुछ दिनों बाद, रौनक, छाया के साथ वृंदा की शादी की योजना बनाने लगे थे -
"छाया, मैंने वृंदा की शादी के मुहुर्त के लिए पंडित जी से मुलाकात की थी तो उन्होंने दो - तीन मुहुर्त बताएं, वह कल अपने घर आने
वाले हैं तो माँ जी से भी पूछ लेते हैं.....! हैं न....?"
रौनक ने आशा भरी मुस्कान के साथ छाया से पूछा।
"हाँ .....हाँ ......क्यों नहीं......! अच्छा रिश्ता है, और यदि कुंडली मिल जाती है तो पंडितजी और माँ जी के आशीर्वाद से आगे बढ़ेंगें.........!"
अपनी माँ रोहिणी और छाया की प्रतिक्रिया से प्रोत्साहित होकर, रौनक ने अनिमेष के माता-पिता से बात करने का फैसला किया।
दीर्घा और विनय प्रकाश को रौनक और छाया व्यवहार पसंद आया था और सबसे बड़ी बात कि उन्हें वृंदा बहुत ही पसंद आई थी
जिस कारण वह भगवान का आर्शिवाद समझकर इस काम को करने लगे थे ।
उन्होंने, अनिमेष और अन्वेषा से भी वृंदा के बारे में राय ली; वह लोग भी वृंदा के व्यवहार और रौनक के परिवार से बहुत ही खुश थे ।
दोनों परिवारों ने आपस की सहमति से शुभ मुहूर्त में सगाई करने का निर्णय लिया ।
नियत समय पर दीर्घा और विनय प्रकाश, अनिमेष और अन्वेषा के साथ वृंदा से मिलने रौनक के घर पहुंच गए थे ।
उनके पहुंचते ही रौनक ने उनका ह्रदय से स्वागत किया ।
छाया ने अपनी समझ से सारी तैयारियां बहुत ही उम्दा तरह से की थीं।
अपनी सहेली जैसी हमराज और प्यारी ननद को देखने आने वाले लड़के वालों के आने की खुशी में छाया ने कोई कोर - कसर,
अपने जानते हुए नहीं छोड़ी थी।
उनकी रूचि के अनुसार ही अनेक प्रकार के व्यंजन खुद तैयार किए थे और कुछ बाजार से मगाए थे ।
तन्मय, छाया के साथ किचिन से नाश्ते को सजाने में मदद कर रहा था ।
ड्राइंग रूम में अनेक प्रकार के व्यंजनों की खुश्बू तैर रही थी जिन्हें उन सबसे लेने का आग्रह बारी – बारी से रोहिणी, छाया और रौनक
कर रहे थे ।
छाया की आँखेँ धैर्य और सत्कार भरीं, उसके आतिथ्य प्रवीणता को दर्शा रहीं थीं ।
विनय प्रकाश जी का परिवार उनकी आवभगत से संतुष्ट नजर आ रहा था।
जलपान के बीच अनेक प्रकार की औपचारिक और अनौपचारिक बातें उन सबके बीच चल रहीं थीं ।
दीर्घा ने ड्राइंग रूम की सजावट और खाने की रूचि और बात व्यवहार से उनकी हैसियत का अंदाजा कर लिया था पर अपने
अनुमानों की सत्यता के लिए वह अनेक तरह के प्रश्न पूछते हुए अपनी जिज्ञासा को शांत कर रही थी; जिसमें उन सबके दादा – परदादा,
कुटुंब और रिश्तेदारों की जानकारी के साथ –साथ वृंदा की पढ़ाई - लिखाई और नौकरी की वर्तमान पद स्थापना आदि थीं ।
उन सभी लोगों को भरपूर संतुष्ट भांपकर तय समय पर छाया, वृंदा के व्यक्तित्व के अनुसार आकर्षक साड़ी में तैयार कराके उन सबके
सामने अपने साथ लेकर आई थी ।
वृंदा की गरिमामय उपस्थिति से विशेष आकर्षण झलक रहा था जो उसके विनम्र व्यवहार से कमरे में मौजूद सभी लोगों को मंत्रमुग्ध कर
रहा था ।
सामान्य लेकिन विशिष्ट परिधान में रौनक अपनी बहिन वृंदा को देख कर ह्रदय से आल्हादित हो रहा था और छाया के चुनाव की मन ही
मन प्रशंसा भी कर रहा था जिसने अपनी रुचि और रुझान के साथ इस अवसर का आयोजन किया था।
अपने सामने अपनी भावी पत्नी के आने से अनिमेष के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी ।
दीर्घा और विनय प्रकाश मन ही मन वृंदा को अपने परिवार के समकक्ष तौल रहे थे ।
अन्वेषा एक साक्षी की तरह बैठी हुई सभी की गतिविधियों को बड़े गौर से देख रही थी और अपनी भावी भाभी वृंदा को देखकर प्रभावित हो
रही थी ।
सोफ़े पर बैठी वृंदा सभी लोगों को बारी - बारी से देख रही थी और समय - समय पर पूछे जाने वाले प्रश्नों का बखूबी जवाब भी देती जा रही
थी जिससे वह सब लोग संतुष्ट जान पड़ रहे थे ।
अनिमेष और वृंदा को आपस में बातचीत के लिए अकेला छोड़कर वह सब बाहर आंगन में आ गए थे जहां पर दीर्घा, विनय प्रकाश और
अन्वेषा आपस में बातें करने लगे थे।
विनय प्रकाश जी से रोहिणी ने कहा –
“जैसा जो कुछ है वह सब आपके सामने है । मैंने रौनक और वृंदा में कभी भी भेद नहीं किया । उन्हें वह सब दिया जो वक्त की जरूरत
थी । मेरी बहू छाया ने उसे अपनी ननद नहीं बल्कि अपनी बहिन ही माना है और रौनक, छाया, वृंदा और तन्मय ही मेरा परिवार हैं
बस......! अब, सब आपके सामने है । अब जैसा आप सबका निर्णय हो....... !!”
अनिमेष और वृंदा के लिए ही वह लोग विमल की शादी में ही इकट्ठे हुए थे शायद.....!
क्षणिक भेंट ही भावी जीवन की पहली सीढ़ी होती है जो आकस्मिक और अप्रत्याशित रूप से जीवन भर का साथ निभाने का वादा
करती है; यह संयोग ही है जो जन्मों से एक दूसरे के लिए बने हुओं को आपस में मिलाता है ।
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