अनुभूति-1 [6(22)] होटल सम्राट में वृंदा और छाया द्वारा सरितकान्त का आमंत्रण
(22)
शहर के दक्षिणी दिशा में स्थित, होटल सम्राट, शहर की समृद्धि को दर्शाता संपन्नता के प्रतीक के रूप में इठलाता खड़ा था,
जिसका नियोन साइन बोर्ड नदी के पार पहाड़ियों से भी दिखता था ।
यह वैभव शाली होटल अपनी दाईं ओर बहती नदी के किनारे पर था, जिसके सामने से फ़ोर लेन सड़क तिराहा बनाती हुई,
चौड़े पाट वाली गोमती नदी के उस पार कस्बों / गावों की ओर निकल गई थी ।
इसी मोड़ ( नदी के पुल पर जाती हुई सड़क के बीच ) के बाएं किनारे पर अंडर ग्राउण्ड सीवेज लाइन का बहुत बड़ा चैम्बर था
और पुल से भी होटल सम्राट का नियोन साइन बोर्ड दिखाई देता था।
एक खुशनुमा दिन की दोपहर की सुनहरी धूप में जब सरितकान्त, होटल सम्राट के गेट पर खड़े थे तो रिसेस्पनिस्ट ने मुस्कराते हुए
उन्हें, गुलाब के फूलों में लिपटा कार्ड थमाया ।
सरितकान्त ने भी मुस्कराते हुए फूलों में लिपटा कार्ड स्वीकार किया जिसमें उन्हें टेरिस गार्डन में आने का निवेदन, सुनहरे अक्षरों में
लिखा था ।
उनके हाथों में लाल रंग के गुलाब के फूलों का गुलदस्ता और गुलाबी रंग के फूलों से सजी एक वेणी थी ।
वह गुनगुनाते हुए अपने सीने में छाया की छवि लेकर लिफ़्ट से टेरेस पहुचे तो अलौकिक लालित्य की दृष्टि के साथ वृंदा, लिफ्ट
के गेट पर उनकी प्रतीक्षा करती मिली।
उसकी मनमोहक मुस्कान आज के विशिष्ट समय को अप्रतिम बनाने का पहला संकेत थी ।
सरितकान्त को आज के खास दिन के बारे में पता नहीं था ।
वह सहज रूप से होटल के टेरेस में काफी पीने के विचार से आए थे, पर साथ में वह अपने प्रथम मिलन के इस दिन को यादगार
बनाने के लिए कुछ लेकर आए थे जो उनके मनों में हमेशा के लिए अंकित होने वाला था ।
लेकिन अब उन्हें इन लोगों की इतनी तैयारियों से कुछ - कुछ अंदेशा हो रहा था कि आज कुछ विशेष होने वाला है।
सरितकान्त को अपने सामने देखकर वृंदा का दिल धड़क उठा, और चहकते हुए उसने "आपका स्वागत है सरितकान्त जी"
कहकर आदर और सम्मान से अपने दोनों हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया ।
सरितकान्त ने घबराते हुए ही वृंदा के नमस्कार का उत्त्तर दिया था।
उनके माथे पर तब तक सरितकान्त पसीने की बूदें झलक आईं थीं जिन्हें देखकर वृंदा मुस्कराए बिना नहीं रह पाई।
वृंदा समझ रही थी कि सरितकान्त घबराए हुए हैं वह उन्हें उसी दशा में कुछ समय और देखना चाह रही थी इसलिए पीले, लाल, हरे,
बैंगनी और मैरून रंगों के वेलवेट के परदों से सजी एक केनोपी में ले गई और सुगंधित फूलों से सजी कुर्सी पर बैठने को कहा ।
सरितकान्त सम्मोहित से कुर्सी पर बैठ गए, तब वृंदा ने उनकी आँखों में एक पट्टी बांध दी थी - सरितकान्त उसे मना करते ही रह
गए थे । पट्टी बांधते समय इठलाती हुई वृंदा ने सरितकान्त से कहा -
“आपको मेरी कसम है यदि आँखें खोलीं तो....!! जब तक मैं न कहूं आप यह पट्टी नहीं खोलना.....! नहीं तो आज की पार्टी का
बिल आप भरोगे.....!”
कहते हुए वृंदा खिलखिलाकर हंस दी थी जिसे सुनकर सरितकान्त अपने आपको रहस्य लोक में पा रहे थे कि आगे क्या होना वाला
है.....?
यह अनुभव उनके लिए सर्वथा नवीन था ।
वह नाक और कानों से आंखों का काम लेते हुए सूंघ / सुन रहे थे ।
उनके कानों में दूर भागती वृंदा के पैरों की आहटें आ रहीं थीं ।
सरितकान्त के दिल की धड़कनें बढ़तीं जा रहीं थीं तभी एक मनमोहने वाला खुश्बू का झोंका उनकी नाक से उनके दिल में समाता
चला गया।
सरितकान्त का मन उस खुश्बू से विह्वल होता जा रहा था ।
वह अपना आपा खोते जा रहे थे ।
उनका दिमाग काम नहीं कर पा रहा था; साथ ही उनके कानों में पायलों की मधुर ध्वनि के साथ खिलखिलाने की मधुर आवाजें भी
सुनाई दे रहीं थीं जो क्रमशः पास आते हुए तेज हो रहीं थीं ।
सरितकान्त अनुभव कर रहे थे कि पायलों की आवाजें उनके सामने आकर रुक गई थीं और अत्यंत भीनी - भीनी खुश्बू से उनका मन
आनंद के असीम सागर में लहराने लगा था ।
वह अपने आप पर काबू नहीं रख पा रहे थे; पर अपनी बेचैनी को जज़्ब करते हुए उन्होंने वृंदा से कहा -
“अब सब्र नहीं होता वृंदा ......! अब तो बख्श दो, प्लीज.....!!”
वृंदा उनकी बेसब्री की परीक्षा ले रही थी ।
उसी पल सरितकान्त को अपने गालों पर गर्म साँसों की अनुभूति हुई और साथ में अत्यंत रहस्यमई कहीं दूर से आती हुई शहद
से भी मीठी आवाज सुनाई दी –
“इकरार की इंतेहा को जज़्ब कर सीने में अपने,
किस कदर, कर सकेगा दीदार हुश्न का ..............!!”
अवर्णीय, अकल्पनीय और असहनीय होती स्थिति से व्याकुल सरितकान्त, वृंदा से अपने आंखों की पट्टी को खोलने की लगभग मिन्नतें करने लगे थे, पर वृंदा उनको और परेशान के मूड में थी ।
छाया को भी सरितकान्त से मिलने की बेसब्री थी, जो अब बर्दास्त नहीं हो रही थी ।
वह भी जल्द से जल्द उनकी बाहों में जाना चाह रही थी ।
सरितकान्त की कुछ और मिन्नतों के बाद वृंदा ने छाया को उनके सामने खड़ा करके उसके दोनों हाथों को सरितकान्त के हाथों
में देते हुए उनकी आंखों की पट्टियों को खोलने लगी थी पर पट्टियों को खोलने के बाद भी वृंदा ने उनकी आँखें अपनी हथेलियों से ढँक रखीं थीं ।
छाया, सरितकान्त के सामने उनके देखने की प्रतीक्षा में खड़ी थी, जिसका एक - एक पल सदियों से भी लंबा लग रहा था ।
जब वृंदा ने उनकी आँखों से अपनी हथेलियां हटाईं तो अपने सामने साक्षात स्वर्ग की अप्सरा को देखकर विस्मित हो गए थे ।
छाया के अप्रतिम सौंदर्य को वह एक बार पूरी तरह देख भी नहीं पा रहे थे वह जिस अंग को देखते उस पर से उनकी नजर नहीं हट
रहीं थीं ।
किस हद तक खूबसूरत लग रही थी छाया; यह शब्दों में बताना मुश्किल है । उसके अप्रतिम सौन्दर्य पर सरितकान्त मुग्ध हुए जा रहे
थे ।
उनका मन कर रहा था कि अभी यदि इस समय पर वृंदा उनके साथ न होती तो वह कब के उसे अपनी बाहों में लेते।
छाया के रूप माधुर्य से मोहित सरितकान्त आकर्षक मुस्कान को साथ लिए अपने मन ही मन में सोच रहे थे -
“कहीं यह सपना तो नहीं है या कोई छलावा जिसने छाया का रूप धरा है......!“
सरितकान्त को इतने पास देखकर छाया के गोरे - गोरे गाल, लालिमा से रंग गए थे; आंखें शर्म से बार - बार सरितकान्त की नजरों से
मिलतीं / फ़िसलतीं / झुकीं जा रहीं थीं ।
धड़कते दिल से छाया उनके इतने पास खड़ी थी जिससे उन दोनों की सांसें एक दूसरे से मिलतीं सी जा रहीं थीं और इसी अवस्था में
उनके हाथ एक दूसरे के हाथों में कब आ गए इसका उन्हें पता ही नहीं चला.....!!
सरितकान्त का हृदय छाया के इस रूप लावण्य को देखकर काबू में न था।
जीवन के इस अति महत्त्वपूर्ण क्षण में छाया का मन खुला आकाश की भांति था, जिसमें हर तरफ़ कई रंगों के चमकीले इन्द्रधनुष
खिले हुए थे ।
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