अनुभूति-1[7(25)] छाया और सरितकान्त की बातचीत
(25)
तूफान गुजर चुका था ।
छाया शांत होकर सरितकान्त के सीने में सिर रखकर लेटी गई थी ।
उसका नाजुक हाथ सरितकान्त के हाथ में था ।
वह दोनों एक दूसरे को देखते जा रहे थे ।
इस तरह से देखते - देखते छाया, सरितकान्त को अपनी लता सरीखीं लेकिन मजबूत बाहों में जकड़कर बोल रही थी –
“अब तक समझ रही थी कि मुझे जो कुछ मिला है, वह बहुत है लेकिन आप से मिलने के बाद मैं बहुत खाली महसूस कर रही थी….!
आप मुझे पहले क्यों नहीं मिले…..! इतने दिन तक क्यों दूर थी….!! पहले से क्यों नहीं आपके पास आ सकी….!!! ये दिन…..!
ये पल…..! मेरी जिंदगी के सबसे अनमोल हैं…..!! शायद इन्हीं पलों के लिए मैंने औरत के रूप में जन्म लिया था…..! जो आज सार्थक हो गया……..!!“
छाया, सरितकान्त की आंखों में ही देखते हुए बोल रही थी –
“सरितकान्त…..! मैं अब तक नहीं समझ पा रही थी कि मैं भी एक औरत हूं......! बड़े होते समय अन्य लड़कियों की तरह मुझे कभी भी
यह भान नहीं हुआ कि मैं भी स्त्री शरीर लेकर पैदा हुईं हूं …..!!! लड़कियों के हावभाव – विचार, उमंग -उत्साह के बारे में मुझे पता
ही नहीं है.......! ( इतना कहकर छाया चुप हो गई और ठहर कर सरितकान्त की आंखों में देखती रह गई थी जैसे उनमें कुछ ढूंढ रही
हो ) और सच बात तो यह है कि मैं अपने आप को पाना चाह रही थी…..!! अपनी चरम सीमा तक जाना चाह रही थी......!! और आपसे
मिलने के बाद मुझे यह सौभाग्य मिल पाया है........! नहीं तो पता नहीं कितने जन्म तक मुझे इंतजार करना पड़ता....!!“
निःश्वास छोड़े हुए छाया कह रही थी और सरितकान्त अवाक् होकर उसकी बातें सुन रहे थे जो उन्हें अपनी अधूरी कामनाओं,लालसा
ओं और इच्छाओं के बारे में बोलती जा रही थी -
“मैनें भी औरत के शरीर में जन्म लिया है पर अपने आपको कभी औरत नहीं समझ पाई.....! औरत की एक गरिमा होती है। नैसर्गिक
तौर पर उसके शरीर का विकास भी होता है…..! उसके शरीर में भी बदलाव होते हैं, जिनसे उसका मन भी उतार - चढ़ाव भरा होता है……..!! ( फिर अचानक कुछ याद आते ही वह सरितकान्त से चहक कर बोली ) जानते हो सरितकान्त…….! औरत का शरीर हर पल बदलता है.......!
हर माह उसके शरीर में टूट फूट होती है.....! वह खुद ही जानती है कि उसके अंदर क्या टूट रहा है…..! और क्या जुड़ रहा है……..?”
“हां......!” सरितकान्त आश्चर्य से उसका मुंह देखते रह गए ।
“हां.....! यह होता है और तो और एक समय पर औरत का शरीर कहने को भर रहता है पर होता नहीं है…..!! उस समय पर वह न
ही औरत रह पाती है और न ही पुरुष …..! शरीर तो औरत का है, पर अंदरूनी हलचल औरत की नहीं है…..! किसी स्त्री में यह जल्दी होता है और किसी में थोड़े बाद …..! पर, होता जरूर है…..!“
इतना कहते ही वह सरितकान्त से चिपक गई थी ।
“हां......! यही स्थिति मुझ में अभी है.....! मैं भी अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहीं हूं......! जहां अंदरूनी तौर पर मुझमें
बहुत बदलाव हो रहे हैं जिन्हें मैं सहन नहीं कर पा रहीं हूं.....! सरितकान्त.....! मैं दोराहे में हूं....! न तो बड़े होते समय मुझे अपने
स्त्रीतत्व का बोध हो पाया और न ही अब.....! (सरितकान्त उसको सहलाते जा रहे थे और वह कहती जा रही थी ) …..पर आपसे
मिलने के बाद मुझे लगता है कि मैं पूरी हो रही हूं.....! जो कसक मेरे दिल में रह गई थी वह अब निकल रही है......!”
“मुझे भी जो कुछ अभी मिला है, वह मैं अब तक नहीं सोच पाया…..!! जितना प्यार, सम्मान, अपनापन आपसे मिला है…..!! मैं नहीं
समझ सकता हूं कि इस जन्म में मुझे मिल पायेगा……!! एक स्त्री और एक पुरुष के बीच के यह संबंध भर नहीं हैं…… उससे भी बढ़कर हैं….।“
छाया कुछ नहीं बोल पा रही थी ।
वह अपनी आंखें बंद करके ऐसे ही लेटी रहना चाह रही थी पर उसे बाशरूम जाने की इच्छा हो रही थी ।
वह उठकर बाशरूम चली गई और वापस आने के बाद अपने कपड़े पहनने लगी थी।
इसके बाद सरितकान्त ने भी बाशरूम में जाने के बाद अपने कपड़े पहने लिए थे क्योंकि वृंदा के आने का समय हो रहा था ।
अब तक लगभग शाम होने को आ गई थी ।
सूरज नदी के किनारे सुनहरी चमक बिखेर रहा था।
इस दृश्य को देखते हुए छाया ने बेड साइड टेबिल से चाय का थर्मस उठाया और बालकनी पर आ गए थे।
सेंट्रल टेबिल में थर्मस रखकर छाया और सरितकान्त आराम कुर्सियों पर बैठ गए थे ।
सरितकान्त अपने और छाया के गिलास में थर्मस से चाय डालते हुए उसके चेहरे को देखते नहीं अघा रहा था; और उस पर
भीनी - भीनी सुगंधित हवा के साथ नदी के चौड़े किनारे के पार से ढलते हुए सूरज की किरणें, छाया के चेहरे पर पड़ने से उसके
गोरे चेहरे की अद्वितीय आभा को जादुई बना रहे थे ।
सच में जीवन की आपाधापी में भी कभी कभी बहुत ही अद्भुत क्षण आते हैं जो जीवन को जादू सरीखा बनाते हैं।
अपनी तरफ़ सरितकान्त को इस तरह देखते हुए छाया ने मुस्कुराते हुए कहा -
“ऐसे क्या देख रहे हैं.....?”
तब तक सरितकान्त अपने हाथों में चाय के कप पकड़े छाया के पास आ गए और उसे चाय का एक कप थमाकर, उसे अपनी
बाहों में भरकर उसके चेहरे को बहुत गौर से देखते हुए बोला -
“देख नहीं रहा हूं सुन रहा हूं.....! “
छाया ने शरारत से मुस्कराते हुए – “अच्छा.....!! कोई आंखों से भी सुनता है कभी....??”
उसकी यह बात सुनकर सरितकान्त जोर से ठहाका मारकर हंसा - “अरे....!! मैं सांप थोड़े न हूं....!!”
छाया भी उसकी हंसी में शरीक हो गई थी जिस कारण दोनों के हाथों से चाय छ्लक - छलककर गिर रही थी ।
सरितकान्त एक घूंट में सारी चाय पी गए थे और छाया का चेहरा अपने हाथों में लेकर कह रहे थे ।
“सच में मुझे नहीं मालूम था कि हमारा साथ इस कदर हसीन होगा.....?”
छाया उनके सीने से लिपटते हुए कहने रही थी -
“हां.....! मैं भी पहली बार अपने आपको जान पाई हूं । एक नारी का सौंदर्य क्या होता है यह मुझे आज ही पता चला । हम कब
एक हो गए, और कब मैं आपके अटूट प्यार से बंध गई……. पता ही नहीं चल पाया.......!“
सरितकान्त ने सिर्फ़ उसकी बातों का समर्थन ही नहीं किया बल्कि मौन वचन भी दिया जीवन भर इसी तरह से सूक्ष्मता से जीवन के
आनंद के साथ होने का।
छाया, उसके सीने से ऐसे लिपटी हुई थी मानो जीवन ही उसकी रगों में दौड़ रहा हो, उसकी आँखें उस दूर नदी के किनारे को कभी
नहीं छोड़ रहीं थीं जहाँ से उनकी यात्रा शुरू हुई थी।
इस मदहोशी के आलिंगन में छाया सरितकान्त की छाती पर अपना सिर चिपकाए -
“मुझे लग रहा कि वृंदा भी मौजूद है इधर....! वह मेरे पास ही रहती है हरदम....!! मैं उससे कभी अलग होने की सोच भी नहीं
सकती.....? कल उसकी शादी हो जाएगी और वह अपनी ससुराल चली जाएगी.... !!” कहकर छाया रोने लगी थी ।
सरितकान्त ने उसे अपने आगोश में थामे - थामे ही चुप कराया फ़िर भी छाया सिसकियां ले ही रही थी ।
सरितकान्त ने प्यार से थपकियां देकर कहा –
“आप सही कह रहीं हैं, वृंदा के कारण ही तो हम इतने पास आ पाए हैं.....!“
वह एक-दूसरे के और करीब आ गए थे, उनके दिल एक साथ धड़क रहे थे, और वह दोनों नदी के दूर किनारे को उस पल के
आकर्षण में अपने विचारों को खोए देख रहे थे ।
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