अनुभूति-1 [5(14)] सरितकान्त का विशेष अदा से सिगरिट पीना
(14)
सरितकान्त की सिगरेट पीने की शैली बहुत ही अनूठी और आकर्षक थी।
जब भी वह सिगरेट सुलगाते थे तो ऐसा लगता था कि वह जीवित वस्तु हो और उसे जलाकर वह कोई गुस्ताखी कर रहे हों ।
वह सिगरेट को उसके पैकेट से निकालकर बहुत ही बहुत ही प्यार से दो बार उसके फ़िल्टर वाले सिरे से धीमे - धीमे थपकी देते थे
फिर नथुनों से लगाते हुए आंख बंद करके अपनी दोनों अंगुलियों से रोल करते हुए सूंघते थे और अपने सामने वाले की बातें भी सुनते
जाते थे ।
जब उनकी उत्तर देने की बारी आती तब ही वह बात करते - करते सिगरेट को जलाते थे जिससे सिगरेट भभकती जाती थी और साथ
ही साथ उनके मुंह और नाक से चिमनी जैसे धुंआ निकल जाता था ।
बातें करते ही एक गहरा कश लेकर मुंह में भरा धुंआ दूर तक फेकते हुए सिगरेट की जली राख को हौले से झाड़ते थे, जैसे वह
सिगरेट को जलाकर उससे क्षमा माग रहे हों ।
इतनी भव्यता के साथ सिगरेट पीने की उनकी आदत पूरे एमईएस आफिस और समस्त परिचितों में विख्यात थी।
आपस की बातचीत के दौरान रौनक ने एक दिन अपने घर पर ही उनसे पूछा – “आप सिगरेट क्यों पीते हैं.....? यह तो स्वास्थ्य
के लिए हानिकारक है न....?
सरितकान्त ने अपनी परिचित दिलकश मुस्कान से कहा – “दोस्त, सिगरेट पीना एक कला है। यह सिर्फ धुआं अंदर लेने की क्रिया भर
नहीं है; यह स्वाद और सुगंध की संपूर्ण अनुभव के बारे में है.......! अनुभूति.....के बारे में.....!! अपने भीतर ( खिड़की से आसमान
जिस पर बादल तैर रहे थे, दिखाते हुए ) यह जो आसमान देख रहे हो न.....! इसको अपने भीतर महसूस करना; इन बादलों से भी
हल्का अपने को अनुभव करना......! आप सिगरेट नहीं पीते हैं न....! नहीं तो जान पाते कि जिंदगी कितनी सकरी है.....! कितनी तंगदिल
है.......! यह उस तंगदिल जिंदगी से निजात का तरीका है और उनमें बसी हुई छोटी-छोटी खुशियों का स्वाद लेने का मेरा तरीका.......!!”
रौनक को सरितकान्त से इतने गहरे फलसफे की उम्मीद नहीं थी ।
वह एक वाक्य में ही अपने मन की सारी व्यथा कह गए, जिसे रौनक के चेहरे पर कई तरह के भाव उभर आए थे।
रौनक की मनः स्थिति देखकर वह जोर का ठहाका मारकर हंसते हुए कहा – “कुछ नहीं......! कुछ नहीं मेरे दोस्त.....!! बस धुंआ ही
तो जिंदगी है और क्या.....?? और जिदंगी ही धुंआ - धुंआ है......!!! हा......! हा......!! हा......!!!" और जोर जोर से ठहाके लगाकर हंसने लगे ।
उनकी हंसी की आवाज अंदर कमरे
में रोहिणी और तन्मय ने भी सुनी थी, तन्मय
उस समय रोहिणी के पैर दबा रहा था।
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