अनुभूति-1[7(24)] छाया और सरितकान्त का मिलन
(24)
वृंदा के चले जाने पर सरितकान्त और छाया एक-दूसरे को देखते - देखते एक-दूसरे में खोने लगे थे ।
छाया झिझकती / शरमाती, सरितकान्त को चोरी निगाहों से देखती उनके सीने से लिपट गई थी ।
यह आनंद था या इस आनंद भरे मिलन को वह अपनी आंखों से साक्षात होती देख रही थी जो केवल वृंदा ही संभव कर सकती थी ।
सरितकान्त उसको साथ में लेकर चाबी वाले कमरे की ओर चले गए थे ।
सरितकान्त ने छाया के हाथों में कमरे की चाबी पकड़ाई और उसके पीछे उसे अपनी बाहों में भर लिया था और उसकी गर्दन में
अपनी ठोड़ी रखते हुए उसके गालों में अपने गाल लगाकर अपनी आँखें बंद खड़े हो गए थे ।
उनके शरीर के साथ अपना शरीर मिलाती छाया, सरितकान्त की छाया बनती जा रही थी
– अपने तन - मन में स्त्रीत्तव की फुहारों में भीगती सरितकान्त की बाहों में सिमटती जा रही थी।
जब बेसब्रियां हद के बाहर बढ़ने लगीं तो सरितकान्त उसकी हथेलियों में चाबी पकड़ाकर अपने दोनों हाथों से कमरे का ताला
खोलकर कमरे में आ गए थे।
कमरा बहुत ही भव्य और सुंदर था । कमरे में डबल बेड लगा हुआ था। मनमोहक प्रिन्ट वाली चादर कमरे की सुंदरता को चार चांद
लगा रही थी ।
बेड की साईड टेबिल नाइट लेम्प के पास एक ट्रे में फ़ल रख थे, जिनके साथ नक्काशी किए हुए चाय की थरमस के साथ दो छोटे
गिलास और कप रखे थे ।
बेड के सामने वाली दीवार पर किसी रमणीक स्थान का सुंदर चित्र लगा था और उसके नीचे फोर सीटर लकड़ी की नक्काशी वाला
सोफ़ा था, जिसके सामने सेंटर टेबिल पर एक ताजे गुलाब के फूलों का गुलदस्ता रखा था ।
सोफे के दाहिनी ओर बड़ी सी खिड़की थी जिस पर हवा से लहराता झीना पर्दा था ।
खिड़की के पार रिवर फेस बालकनी थी, जिसमें बेंत की एक गोल सेंटर टेबिल के साथ चार इजी चेयर थीं; जिनके बीच सतरंगी छाता
लगा था ।
बालकनी से नदी और उसके पार की पहाड़ियों का मोहक दृश्य मन को लुभा रहा था ।
कमरे के अंदर आते ही सरितकान्त ने कमरा अंदर से बंद कर दिया था और छाया को अपनी बाहों में लेकर बेतहाशा चूमने लगे थे ।
छाया अपनी बेचैनी को अपने साथ लेकर सरितकान्त की आंधी में बहती जा रही थी फिर अचानक रुक गई और उसने सरितकान्त
को अपनी बाहों में जकड़ लिया और उनकी आँखों में अपनी मदभरी आँखों से देखने लगी थी ।
तब सरितकान्त भी उसकी आंखों में देखते – देखते, अपने जेब से वेणी निकालकर उसके जूडे में लगा दी थी ।
छाया पिघलती हुई सरितकान्त से लिपट गई थी और उनकी धड़कनों में अपनी सांसें डुबोती हुई खड़ी हुई थी ।
सरितकान्त उसकी पीठ सहलाते जा रहे थे और उसके माथे को चूमते जा रहे थे ।
छाया, सरितकान्त का हाथ पकड़कर उनकी गरदन चूम रही थी ।
इस बीच में उन दोनों में कोई बात नहीं हो रही थी ।
छाया, सरितकान्त के मजबूत बदन में बेल सरीखी लिपटी आकाश की ओर बढ़ती जा रही थी ।
मन के किसी कोने में दबी यह उसकी उद्दाम अभिलाषा थी जो आज उभरकर, खुले आसमान में फैलती जा रही थी ।
धीरे - धीरे उनके कपड़ों के बंधन ढीले होते जा रहे थे ।
सरितकान्त और छाया, एक दूसरे में समाते जा रहे थे ।
आज छाया ने पहली बार पुरुष के इस रूप को भी देखा; जो स्त्री के पूरे शरीर को ऊर्जा से इस तरह ओतप्रोत कर सकता है जहां पर स्त्री पहुचकर अपने आप को भाग्यशाली मानती है और उस ऊर्जा से उसे जीवन के अत्यंततम गूढ़ रहस्य का भान भी होता है ।
सरितकान्त से छाया को वह सब मिल रहा था जो कि रौनक से मिलना चाहिए था ।
स्त्री अपना सर्वस्व लुटाना चाहती है, पिघलना चाहती है, बिखरना चाहती है लेकिन पुरुष उसकी इस भावना को नहीं समझता; वह उसे रौंदना चाहता है अपनी ताकत के बल पर जबकि इन संबंधों में ताकत की जरूरत ही नहीं पड़ती !
उस कमरे में छाया और सरितकान्त की सांसों और सीत्कार का सैलाब आ चुका था ।
छाया स्वर्गिक सफ़र की ओर जा रही थी।
उसके सफ़र का साथी - सरितकान्त उसे लेकर बहुत दूर आ चुका था जहां पर उन्होंने अपने रहने के लिये नया नगर बनाया था ।
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