अनुभूति-1[6(20)] छाया का सरितकान्त के व्यक्तित्व को अंगीकार करना
(20)
वह दोनों किसी बात पर हंसते हुए बाहर चले गए थे पर जाते - जाते सरितकान्त की उससे बिना मिलने की इच्छा तो हो रही थी लेकिन
वह सिर्फ अभिवादन ही करके चले गए थे, उनके साथ ही साथ रौनक भी चले गए थे ।
सेंट्रल टेबिल पर सरितकान्त के सिगरेट का पैकेट रखा हुआ था ।
उन दोनों की आवाज का पीछा करते हुए छाया बाहर आई तो वह दोनों जा चुके थे । वह उन्हें जाते हुए छाया देखने लगी और फिर
ड्राइंग रूम की ओर आने लगी पूर्णतः सरितकान्त बनकर ।
सरितकान्त के जैसे ही दिलकश मुस्कान के साथ नमस्कार करते हुए वह उन्हीं की तरह सोफ़े पर आकर बैठ गई थी और सेंट्रल टेबिल
पर रखे सिगरेट के पैकेट से सिगरेट जलाकर पीने लगी थी और रौनक के पूछे गए सवालों का जवाब ठीक उन्हीं के स्वर में उन्हीं
की अदा से देते हुए बात करने लगी ।
दूर से हो रही बातचीत की धीमी आवाजें वृंदा के कानों तक पहुंचीं और उसने सरितकांत की आवाज पहचान ली और फिर से
सरितकांत के वापस आने की उत्सुकता लिए, उसने अपने एप्रन पर हाथ पोंछा और ड्राइंग रूम की ओर चली गई।
अन्दर आते ही वृंदा की आँखें आश्चर्य से फैल गईं थीं।
वहाँ, छाया, उसकी भाभी, अपनी उंगलियों के बीच सिगरेट लटकाए सोफ़े पर बैठी थी। कमरा धुएँ से धुँधला था और छाया अपनी ही
दुनिया में खोई हुई लग रही थी।
जब वृंदा ने छाया के इस अप्रत्याशित परिवर्तन को पूर्णतः सरितकांत के व्यक्तित्व बदला हुआ देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न था ।
पर्दे के पीछे से, वृंदा चुपचाप देख रही थी, उसका दिल अपनी भाभी की इस स्थिति से चिंता से ग्रस्त था।
छाया की हरकतें, उसके हावभाव, यहां तक कि जिस तरह से उसने सिगरेट पकड़ी थी - सब कुछ सरितकांत के विशिष्ट व्यवहार को प्रतिबिंबित कर रहा था।
वृंदा गौर से छाया के इस रूपांतरण को देख रही थी और जान रही थी कि कहीं यह वह कौतूहलवश तो नहीं कर रही है पर हर तरह से परखते हुए उसे यह एहसास हुआ कि छाया यह स्वाभाविक तौर पर कर रही है ।
यह महज़ संयोग नहीं है ; छाया का स्वतः ही सरितकान्त के व्यक्तित्व में परिवर्तन है।
इस रहस्योद्घाटन से वृंदा टूट सी गई थी।
वह समझ रही थी छाया, सरितकान्त से तो प्रभावित तो है ही पर इस तरह वह उनके सभी हाव - भाव को पूर्णतः अंगीकार कर लेगी
इसका उसे भान न था ।
आमतौर पर संयमित और सौम्य रहने वाली अपनी भाभी छाया को इस तरह से उसका अनुकरण करते देख वृंदा हतप्रभ रह गई।
वृंदा अब खुद को रोक नहीं पा रही थी लेकिन उसके सामने भी नहीं जा पा रही थी ।
उसके मन में यह भी था कि घर का कोई सदस्य यदि इस समय आ गया और उसने छाया को इस अवस्था में देख लिया तो उसके
बाद क्या होगा ?
यही सोचकर वह और परेशान हो रही थी।
सरितकान्त के रहते समय जो जो घटनाएं हुईं थीं अक्षरशः उन्हीं घटनाओं को दुहराती छाया अपने बीते समय को फिर जी रही थी;
अपने आप में सरितकान्त के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ओढ़कर ।
फिर एक जोरदार मर्दाना ठहाके के साथ छाया उठी जोर से सरितकान्त की आवाज में ही “नमस्कार......! भाभीजी चलता हूं .....!!”
कहकर छाया ड्राइंग रूम के दरवाजे तक आई और खड़ी हो गई ।
थोड़ी देर खड़े रहने के बाद जब वह वापिस आई तो उसका चेहरा भावहीन था और सोफ़े में आकर वह कटे वृक्ष की तरह गिर
गई उसकी आँखों से आंसुओं की धाराएं बह निकलीं।
परदे की ओट से वृंदा निकलकर कमरे में आ गई थी और छाया को ही उसकी ही तरह अपनी आँखों में आंसू भरे हुए देखे जा रही थी ।
काफी देर तक छाया इसी स्थिति में रही और अब उसने जोर से अंगड़ाई ली और आंसू बहाते अपने सामने वृंदा को देखा तो उसे
देखते ही बोल पड़ी –
“अरे......! क्यों रो रही हो.....? आओ अंदर चलते हैं......!!”
और वृंदा की कमर में हाथ डाले ऐसे चल पड़ी जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
वृंदा, अपनी भाभी के रहस्यों की मूक साक्षी बनी अवचेतन के अज्ञात पहलू को अपने दिल में संजोए उसके साथ अंदर चली गई ।
Comments
Post a Comment