उपन्यास "अनुभूति - 1" की प्रस्तावना-
आज से मैं आपके सामने अपने उपन्यास "अनुभूति" के पहले भाग का नियमित प्रकाशन करूंगा । इसी संदर्भ में प्रस्तुत है
उपन्यास "अनुभूति - 1" की प्रस्तावना -
"अनुभूति - 1"
लेखक राजेश कुमार दुबे
चरणों में:-
मातरश्चकृराधात,
ब्रह्माण्यम पितरं यत्सः।
तदप्सु सृजति बन्धुं,
जनाय तत्त्वातमं यत्॥
(ऋग्वेद 7.56.1)
"वह जो ब्रह्माण्ड की आदि माता के रूप में पूजनीय हैं, समस्त अस्तित्व की शाश्वत पोषक हैं, वही ईश्वर हैं जो जल के माध्यम से बंधनों को बढ़ाती हैं तथा समस्त सृष्टि को जन्म देती हैं।"
अनुभूति : भावुक / मूक संवेदनाऐं
अपने स्त्रीपन की तलाश में छाया का निर्णय…….
..............आत्म संवेदन
मानव जीवन के महत्वपूर्ण चरणों में एक चरण है दाम्पत्य जीवन जिसकी सफलता स्त्री और पुरुषों के बीच परस्पर समन्वय पर टिकी है जिनका समाज की हर गतिविधियों, परंपराओं और रीति - रिवाजों पर बराबर का अधिकार है फिर भी, सम्मिलित सपनों और आपसी सम्मान के आवरण के नीचे, महिलाओं की जटिल वास्तविकताएं मौजूद हैं।
यह उपन्यास उनके (महिलाओं) द्वारा सहे जाने वाले मौन संघर्षों, अनदेखी किए गए बलिदानों और सामाजिक अपेक्षाओं पर प्रकाश डालता है। इन विषयों की व्यापक रूप से खोज, उनके अनुभवों की गहराई को उजागर करती है जो अधिक न्यायसंगत सामाजिक परिवर्तन को स्वीकार करने पर बाध्य करती है ।
पितृसत्तात्मक अनुशासन से संरचित समाज में महिलाओं की भूमिकाएं गौण हीं हैं। इसी समाज में जिंदगी के उल्लास / शोर के बीच, त्याग और स्नेह की प्रतीक वृंदा और छाया जैसी दो आत्माएं, अनगिनत संघर्षों के प्रतिनिधि के रूप में अपने परिवार की मान्यताओं का निरंतर पालन कर रहीं हैं । वह सामाजिक मूल्यों की सीमाओं में निहित, चुनौतियों और बलिदानों को अपनी आकांक्षाओं और व्यक्तिगत भलाई से ज़्यादा अपने परिवार के कल्याण और सामाजिक अपेक्षाओं को प्राथमिकता देंतीं हैं ।
उनकी अनुभूति; अनगिनत, अनदेखी, अनकही चुनौतियां, जिजीविषा तथा तिरस्कार पर प्रकाश डालती है। उनका अस्तित्व, मौन संघर्षों में निरत व्यक्तिगत अपेक्षाओं पर नहीं बल्कि उन लोगों के सामूहिक कल्याण के लिए होता है जिन्हें वे प्रिय होतीं / मानतीं हैं । इन भूमिकाओं के अनुरूप होने का दबाव उनमें कई तरह के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक समस्याओं के साथ, रिश्तों में संचार और समन्वय, शृंग और गर्त की भांति स्थापित करता है।
उनकी यह कथा, कागज पर केवल स्याही ही नहीं है; बल्कि अनगिनत महिलाओं की है, जो चुपचाप अपने शरीर पर होने वाले बदलावों को सहन करते हुए सामाजिक कसौटियों का दृढ़ता से पालन करती हैं, जबकि उनकी अपनी आवाजें अनसुनी रह जाती हैं। उनके द्वारा किए गए बलिदान अपेक्षाकृत कम या अदृश्य माने जाते हैं जो उनकी भावनात्मक और मानसिक हानि कराता है ।
यह उनमें अलगाव, हताशा, चिंता और आत्म-पहचान की अपूर्णता, आक्रोश की भावना के अनुभव के साथ, उनके पति और परिवारों की रूढ़ियों और समझ की कमी से और भी बढ़ जाता है जिसके साथ पारिवारिक स्वतंत्रता बाधित होती है और उनकी व्यक्तिगत पहचान पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है ।
घरेलू ज़िम्मेदारियां, बच्चों के पालन-पोषण और सामाजिक आचरण से जुड़ी अपेक्षाएँ, महिलाओं के व्यक्तिगत विकास और लक्ष्य पूर्ति के अवसरों को सीमित करतीं हैं । सामाजिक विधियां (कुरीतियां), सांस्कृतिक मानदंड, आर्थिक कारक और लैंगिक भूमिकाएँ; पारिवारिक जिम्मेदारियों में असंतुलित कर उन्हें अधीनस्थ बनातीं हैं जो उनकी अपनी अभिलाषाओं / महत्वाकांक्षाओं में बाधा बनकर उनके निजी कैरियर त्याग का कारण बनतीं हैं ।
इन्हीं पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच के असंतुलन और बलिदान से उपजी अकथनीय पीड़ा, उनके शरीर और मन दोनों से विकार प्रकट करती है जो अलगाव, निराशा, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में प्रगट होता है। परिवार की सीमाओं के भीतर, जहां प्रेम को सर्वोच्च होना चाहिए उसमें वह खुद को उदासीन और भ्रांति की जंजीरों में जकड़ा हुआ पातीं हैं।
उनके सहचर, उनके हृदय में गूंजने वाली चीखों से बेखबर, उनकी पीड़ा की गहराई को समझने में विफल रहते हैं और वह संघर्ष करतीं रह जातीं हैं ।
एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और मूक संघर्षों के प्रति सहानुभूति रखने में असमर्थ दाम्पत्य जीवन ?
क्या यही मानवता की नियति है ?
ऐसे संचारहीन, किसी भी रिश्ते की आधारशिला, अपेक्षाओं की दीवारों के नीचे लड़खड़ाती है और अपने पीछे एक ऐसा शून्य छोड़ जाती है जिसे कोई भी भौतिक संपत्ति नहीं भर सकती। फिर भी, अंधेरे के बीच आशा की किरणें (सरितकान्त), उन्हें अपने अनुभवों से ताकत दिलातीं हैं, उन्हें एक साथ बांधतीं हैं जिससे वह अपने आपको अकेले नहीं समझ पातीं हैं।
वृंदा और छाया जैसी महिलाओं के अनुभव अलग-अलग मामले नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक स्थिति का प्रतिबिंब हैं। महिलाओं के संघर्षों से सहानुभूति, समझ और प्रणालीगत परिवर्तन; संवाद, समर्थन और समानता को बढ़ावा देते हैं ।
महिलाओं के अनुभव हमारी सभ्यता के ताने-बाने का अभिन्न अंग हैं, जो अनगिनत स्त्रियों द्वारा किए गए मौन बलिदानों को स्वीकार करने के महत्व को रेखांकित करते हैं। इन चुनौतियों का समाधान करके हम एक ऐसे भविष्य की दिशा में काम कर सकते हैं जहाँ हर व्यक्ति / लिंग की परवाह किए बिना मूल्यवान और सशक्त महसूस कर सकें ।
उनके अनुभव हमारी सभ्यता की आधारशिला हैं।
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