अनुभूति-1 [7(23)] छाया का जन्मदिन मनाना
(23)
अपने मन के भावों को प्रदर्शित करती चमकीले लाल बॉर्डर वाली छोटे- छोटे रंगीन फ़ूलों की प्रिंटिड हल्के पीले रंग की साड़ी
पहने छाया ने एक ऐसी चमक बिखेरी जो गुलाब की पंखुड़ियों पर ओस से भीगी लाली को प्रतिबिंबित कर रही थी।
उस पर उसने जो लाल ब्लाउज पहना था, वह सरितकान्त के प्रति उसके जुनून को दर्शाता हुआ लग रहा था ।
उन दोनों के दिलों की अंतरंग कामनाओं को साकार करने के उद्देश्य से वृंदा ने आँखों में शरारत भरकर हँसते हुए कहा –
“बर्थडे गर्ल, तैयार है, अब इंतजार नहीं हो रहा है......!!”
सरितकान्त और छाया, एक दूसरे को देखते हुए हाथों में हाथ लिए मुस्कराते हुए टेबिल के पास आ गए थे, जिसमें केक रखा था ।
वृंदा ने उनकी ओर मुस्कराते हुए देखकर प्लास्टिक का चाकू छाया को सौंपते हुए, एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई, जो
उनके बीच के अनमोल क्षणों को जीवंत करने के लिए लालायित थी जिसे दोनों ने आमंत्रण भरी नजरों के साथ स्वीकार कर लिया था ,
साथ ही साथ वृंदा ने केक पर मोमबत्ती जला दी थी, जिससे कैनोपी के रंगीन प्रकाश में छाया का सौंदर्य और निखर गया था ।
वृंदा, आज पहली बार अपनी भाभी को इतने उत्साह और प्रसन्नता के साथ अपना जन्मदिन मनाते देख रही थी जबकि वास्तव में
छाया का जन्मदिन आज था ही नहीं !
उसने तो सरितकान्त से मिलने के लिए आज जन्मदिन की रूपरेखा तैयार की थी ।
वृंदा सब कुछ जानते / समझते हुए भी छाया को उसकी हर खुशी में बढ़ - चढ़कर बराबर उसका साथ दे रही थी ।
छाया के साथ ही उत्साहित होते हुए वृंदा ने खिलखिलाती हँसी में "हैप्पी बर्थडे टू यू...." गाया।
सरितकान्त और वृंदा के समवेत स्वरों में इस गाने की ध्वनि, छाया को आत्मिक आल्हाद की स्थिति में पहुचा रही थी ।
छाया के केक काटने के साथ ही सभी की सम्मिलित हँसी की मधुर फ़ुहारों के बीच, सरितकान्त ने केक का एक टुकड़ा लेकर छाया
को खिला दिया था।
छाया, सरितकान्त से, “मुझे...मुझे...” कहती रह गई थी।
वृंदा, दो दिलों के अनुपम मेल की साक्षी बनती जा रही थी ।
उसकी उपस्थिति की अलौकिकता में वह दोनों (सरितकान्त और छाया), दुनिया से बेखबर आनंद के उत्सव को अविस्मरणीय बना
रहे थे ।
उनका सम्मिलित आमोद, हंसी की फ़ुहारों के साथ होटल सम्राट की टैरेस को जीवंत बना रहा था।
छाया और सरितकान्त अपने हाथों से मिलन के ज्वार से भरीं खुशियों को समेट रहे थे ।
छाया निहाल हुई जा रही थी ।
अब न उनका कोई अतीत है
और न ही भविष्य,
है तो केवल वर्तमान -
जो ..............
अभी है.....!
अभी है.....!!
अभी है..... !!!
उन्हीं हंसी की फ़ुहारों के साथ वृंदा ने अपने पर्स से एक चाबी निकालकर उनकी ओर बढ़ा दी और रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ –
"मैं पाँच बजे वापिस आऊँगी.....!!"
कहा जो उन दोनों के लिए अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक था ।
वह दोनों अवाक् से वृंदा की ओर देखते रह गए थे ।
छाया ने कांपते हाथों से वह चाबी ले ली और उन दोनों को विस्मृत करती हुई वृंदा लिफ़्ट की ओर चली गई थी ।
किंकर्तव्यविमूढ़ (Bewildered)से वह दोनों उसको जाते हुए देख रहे थे ।
छाया ने तो उसे केवल सरितकान्त से मिलने भर कहा था पर वह तो उसे जिंदगी में कभी न भूलने वाली सौगात दे रही थी।
सरितकान्त भी शायद यही कुछ सोच रहे थे ।
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