अनुभूति-1 [6(21)] छाया का वृंदा से सरितकान्त से मिलने को कहना

 

(21)

मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (एमईएस) में क्लर्क के रूप में अपनी नौकरी की शुरूआत के साथ - साथ सरितकांत .....

सरितकांत कौन थे ? उनकी पत्नी, बच्चे  और व्यवसाय के बारे में  जानकारी के लिए इस उपन्यास का दूसरा भाग अनुभूति - 2 

पढ़ें ...... ! जो जल्द ही प्रकाशित हो रहा है....

...... उनके समर्पण और कौशल के प्रमाण के रूप में खड़ी थी।

दिन बीतने के साथ साथ छाया और सरितकान्त की दोस्ती परवान चढ़ती गई।

यह जानते हुए कि उसकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली आवाज़ और आकर्षण के पीछे, वह सिर्फ एक और व्यक्ति था जिसके अपने 

संघर्ष और कमजोरियाँ थीं और इसीलिए, उनकी दोस्ती गहरी हो गई ।

सरितकान्त से मिलने की उत्कट अभिलाषा ने छाया के कोमल तन में अंगारे भर दिए थे, जिससे उसको सरितकान्त से मिलने की 

तीव्र लालसा हो रही थी और उसने यह बात वृंदा को बताई भी ।

छाया के ह्रदय में सरितकान्त के अलावा कोई न था ।

वह संपूर्ण रूप से सरितकान्त को ही अपना आराध्य मान बैठी थी और किसी भी तरह सरितकान्त के साथ समय बिताना चाह रही थी ।

इसी उद्देश्य को लेकर वह अपने लालायित हृदय से, सरितकान्त से मिलन की आशा में वृंदा से इस बात का जिक्र कर बैठी।

वह दोनों छाया के ही बैड रूम में बैठीं  थीं ।

वृंदा,  ध्यान से सुन रही थी, जब छाया ने अपने दिल की बात बताई तो चिंता से उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

“क्या यह उचित होगा भाभी.....!! स्नेह, प्यार, लगाव तो ठीक है पर अकेले में मिलना....?? वह भी शादी - शुदा हैं उनके भी दो

 बच्चे हैं.....!! समझ नहीं आता क्या करूं....!!”

छाया गंभीर होकर सुनते हुए –

“जानती हूं सब कुछ.....!! लेकिन, जिंदगी के इस मोड़ पर मैं असहाय हूं.....!! मै भी नहीं समझ पा रही हूं....! उचित - अनुचित का

 पता नहीं, वृंदा....! क्या तुम दो दिलों को मिलाने में मदद नहीं कर सकती हो....?

बुद्धिमान और सतर्क, वृंदा पहले तो झिझकी, उसका मन छाया के शब्दों से डोल गया था।

निषिद्ध प्रेम का निषिद्ध आकर्षण उसके सामने था, जो उसे कर्तव्य और इच्छा के बीच की रेखा को पार करने के लिए प्रेरित 

कर रहा था लेकिन उसने खुद को कर्तव्य के पथ पर पाया चाहे वह कितना भी वर्जित क्यों न हो।

क्या वह तड़पते दिलों की ओर से आंखें मूंद सकती थी जो एक-दूसरे के आलिंगन में सांत्वना तलाश रहे थे ?

क्या वह उन्हें उस दुनिया में प्यार पाने का मौका देने से इनकार कर सकती थी जो उन्हें अलग रखने के लिए प्रतिबद्ध थी?

यह सब जानते हुए भी कि उसकी भाभी उसके भाई के साथ अपने घर में ही नितांत अजनबी की तरह रह रही है और उसे मानसिक 

तौर पर मजबूत सहारे की आवश्यकता है ?

हालाँकि, छाया की विनती, हताशा और अत्यंत आत्मीयता के स्वरों ने वृंदा के दिल को झकझोर दिया था। 

बहुत विचार करने के बाद आह भरते हुए वृंदा ने फैसला लिया।

वह छाया को सरितकांत से मिलने का रास्ता जरूर ढूंढ़ेगी !

भले ही इसका परिणाम कुछ भी क्यों न हो ?

छाया के अनुनय, आग्रह और नितांत अंतरंगता के स्वर से प्रेरित अनुरोध को अस्वीकार न कर सकी और सरितकान्त से उसके

 मिलन की राह निकालने लगी ।

Comments

Popular posts from this blog

अनुभूति-1 [6(22)] होटल सम्राट में वृंदा और छाया द्वारा सरितकान्त का आमंत्रण

अनुभूति-1[7(25)] छाया और सरितकान्त की बातचीत

अनुभूति-1 [5(14)] सरितकान्त का विशेष अदा से सिगरिट पीना