अनुभूति-1 [5(19)] छाया और वृंदा की बातचीत

 (19)

छाया की आंखों से आंसू जार - जार बह रहे थे । 

वह शून्य में ही देखे जा रही थी, तब वृंदा उसे अपनी बाहों में लेकर उसकी आंखों से बहने वाली अविरल धारा को पोंछ रही थी ।

"भाभी.....!!"

छाया को अपने गले से लगाकर वृंदा उसकी पीठ थपथपाते बोल रही थी, उसका यह बोलना छाया को मरहम की तरह लग रहा था -  

"आपके आँसू, आपकी अभी तक की कुंठाओं के ज्वार हैं.....! इन्हें बहने दो.....!!"

वह दोनों भावनाओं के शिखर पर खड़ीं थीं, छाया के आँसू शबनम की तरह दिखाई दे रहे थे ।

प्रत्येक बूँद की अलग यात्रा थी, जिसका सिरा नियति की अज्ञात धाराओं से  जुड़ा हुआ था ।

कमरे के सन्नाटे में, खिड़की के पल्ले के पेंट को खरोंचतीं वृंदा की अगुलियां, परंपराओं के विरुद्ध प्रश्नों के निशान बनाती प्रतीत 

हो रहीं थीं जिनका उत्तर आसान न था।

वह छाया जो कभी परिभाषित और सीमित थी, अब अनंत के किनारों को छूने के लिए लालायित होने लगी थी।

 अपनी आँख से गिरने वाली हर बूंद के साथ, उसने अपने अतीत की परतों - संदेह, भय और असुरक्षा को दूर कर दिया था  -

उसकी आँखों के सामने इंद्रधनुषी आभा चमकने लगी थी ।

वृंदा की आँखें भी झिलमिलाने लगीं थीं ।

वह छाया की पीठ थपथपाते हुए कह रही थी - "भाभी....!! हमें अपने पंखों को खोलने के लिए, अपने अब तक के वक्त के कोकून

छोड़ना ही पड़ेगा.....! यह बहुत कठिन है पर इसके बाद के चमकीले पंख और सतरंगी आसमान आपका इतंजार कर रहे हैं.......!"

छाया के आँसू बह ही रहे थे और वह उस अनवरत प्रवाह में समाती चली जा रही थी और अपने आप को खोती जा रही थी या 

पाती जा रही थी;  जिससे एक नई छाया उभर रही थी,यह दोनों चीजें एक साथ ही हो रहीं थीं ।

अब तक उसके मन में जो कुछ बंधा रखा था या छुपा रखा था; वह सब इस प्रवाह में धुल रहा था ।

छाया के सभी आंसुओं को वृंदा के कंधों ने सोख लिया था जो उसकी हर बीती याद को अपने प्यार भरी थपकियों से छाया के 

जीवन से दूर करती जा रही थी ।

वह और उज्जवल होकर सामने आ रही थी ।

अब वह पुरानी वाली छाया न रहकर, अलग ही व्यक्तित्व वाली छाया बन चुकी थी । गहरी मुस्कान के साथ, छाया ने स्वीकार किया –

 "हां, वृंदा मुझे ऐसा लगता है जैसे सरितकान्त ने मुझे नए सिरे से गढ़ दिया है, और मुझे वास्तविक रूप में तराश दिया है।"

वृंदा की उंगलियों ने छाया के गाल से आंसू पोंछ दिए थे ।

लान में लगे पेड़ों की पत्तियां हवा के मंद - मंद झोंकों से हिल रहीं थीं,  जिनसे धूप, दीवार पर कई तरह की आकृतियां बना रही थी 

और उन्हीं आकृतियों में घुल - मिलकर छाया का रूप उन्हीं के जैसे हो रहा था पर आश्चर्य इस बात का था कि वह सभी छायाएं रंगीन थीं ।

उनमें कई तरह के रंग उभरकर झिलमिला रहे थे, जैसे कैनवास पर सभी रंगों का समुचित संयोजन हो, पर उन रंगों में यादों और 

अनुभवों के स्याह रंग नहीं थे ।

तभी किसी बात पर सरितकान्त और रौनक के सम्मिलित जोरदार ठहाके से , छाया की आंखें खुलीं, जिनके बहते आंसुओं में डूबी 

हुई अतल गहराइयों में गोते लगा रही थी ।

 जैसे अञ्जाने में ही सरितकान्त उसके जीवन के रूपांतरण पर हंसते हुए उसका स्वागत कर रहे हों और रौनक भी अञ्जाने में ही; 

छाया की नियति, उसकी सुप्त अभिलाषा की जागृति का समर्थन  कर रहे हों ।

वृंदा, अपनी भाभी को धीरे-धीरे थपकियां देकर संबल दे रही थी मानों उसे संवार रही हो कुम्हार के कच्चे घड़े के जैसे ।

 

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