अनुभूति-1 [5(18)] छाया की अनुभूति -3
(18)
अपने मन में, इस समय पर अकथनीय बंधनों के अप्रत्याशित अमिट छाप से आह्लादित छाया, कमरे में बने हुए सिगरिट के धुंए के
गुबारों को न छेड़ते हुए धीरे - धीरे ड्राइंग रूम से निकलकर किचिन की देहरी में खड़ी वृंदा के पास आ गई थी ।
सरितकान्त और छाया के बीच नवल प्रेम के पल्वित / पुष्पित / सुगंधित होते अभयारण्य में, उनकी परछाइयाँ - प्रकाश के कोमल
आलिंगन के साथ, अनकहे संबंधों की मधुर राग में, जीवन के गीत गाकर नृत्य कर रहीं थीं।
दुनिया से अनजान, वृंदा एक मूक दर्शक के रूप में भी खड़े होते हुए उनके बीच, उस क्षण की उन बारीकियों से परिचित हो रही थी
जो शब्दों से भी परे थीं।
पर्दे के पीछे वृंदा, छाया के अलौकिक भाग्य को लेकर खड़ी थी, उसके हृदय के तार, छाया के हृदय के तारों के साथ लयबद्ध होने की
कोशिश कर रहे थे ।
उसने कोई हस्तक्षेप नहीं किया ।
उसकी उपस्थिति, उन युगलों के मिलन की पुष्टि कराती, उन धागों को जोड़ रही थी जो उन सभी को बांधे हुए थे।
रहस्यमय वातावरण के अनुरूप श्रद्धा के साथ, वृंदा ने सरितकान्त को नमस्कार करके, सरितकान्त और छाया के बीच अनोखे
बंधनों को स्वीकार कर लिया था ।
छाया, अब अपनी सांस बाहर निकालने के लिए स्वतंत्र थी, उसे पता ही नहीं चला कि उसने सांस रोक रखी थी, उसने ट्रे को मेज पर
रख दिया था ।
लकड़ी पर चीनी मिट्टी की खनक, कमरे की धड़कन के साथ गूँजने लगी थी। फिर भी, इससे पहले कि छाया की सांस पूरी तरह
से उसके होठों से बाहर निकल पाती, वृंदा उसके बगल में अंधेरे में रोशनी की तरह प्रकट हुई।
छाया को अपनी उस स्थिति पर बहुत आश्चर्य हुआ लेकिन वृंदा की उपस्थिति से उसे अकथनीय सांत्वना मिली।
उन्होंने बिना कोई शब्द बोले संवाद किया क्योंकि शब्दों की आवश्यकता नहीं थी।
प्रेम भावनाओं की नदी है, जिसे किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है।
उस शांत क्षण में, जहां समय रुका हुआ लग रहा था और साधारण, असाधारण के पार पहुंच गया था; छाया और वृंदा एक साथ खड़े थे।
उनके दिल अनकहे शब्दों से गूंज रहे थे, जो मूर्त अस्तित्व से परे बने बंधनों के प्रमाण थे ।
छाया अभी तक सरितकान्त के सम्मोहन में ही थी ।
उसकी कोमल उंगलियां, सरितकान्त की सम्मोहक देहयष्टि और दृष्टि के स्वामित्त्व से पूर्ण, अलौकिक स्पर्श से आलोकित, आलिंगन
से कांप रहीं थीं ।
वृंदा के पास आते ही छाया, उसके गले लगते हुए कह तो रही थी पर दिल की बात कहने में उसके होंठ कांप रहे थे ।
उन्हीं कांपते होंठों में स्वर गूंजते सुनाई दे रहे थे – “वृंदा....!अब मैं खुद में नहीं हूं.....!! मेरा मन, मेरा पूरा शरीर और मैं खुद ही,
धीरे-धीरे अपने आप से खोते जा रहे हैं; मेरा पूरा का पूरा वजूद ही पिघल रहा है, समा रहा है सरितकान्त के आगोश में....! वृंदा,
मैं अपने बस में नहीं हूं.....!! अब मैं बदल गई हूं.....!!! अब मैं गल गई हूं और बह रही हूं नदी के जैसे.......!!!!”
वृंदा की सहानुभूति से भरीं आँखें छाया की स्वीकारोक्ति भरी अनुभूति का भार थाम रही थीं।
उसके देखते - देखते, पंखुड़ियों पर चमकती ओस की बूंदों की तरह, छाया के गालों पर उसके आँसू गिरने लगे थे ।
वृंदा के कंधे पर
सिर को टिकाए हुए वह रोती जा रही है, और अपने
आपको खोती जा रही है (अपने और रौनक के बीच के संबंध को
जहां पर वह दिखावे के तौर पर ही पति पत्नी थे; पर थे अञ्जान पथों के राही। छाया और रौनक की वास्तविकता के परिणाम स्वरूप
तन्मय जो आने वाले तूफ़ानों से बेखबर, अपनी दादी में अपने मां और पिता को तलाश कर रहा था) ।
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