अनुभूति-1 [5(16)] छाया का सरितकान्त से स्पर्श
(16)
सरितकान्त की प्रत्येक सूक्ष्म भावनाओं की सरिता में बहती हुई छाया, मौन अनुग्रह के साथ, उनकी हर अभिव्यक्ति को
अपने तन में प्रतिबिंबित कर रही थी ।
उसके पास पहुचकर वृंदा ने अपना कोमल हाथ धीरे उसके कंधे पर रखा, जिससे वह चौंक गई थी और वृंदा की ओर निर्विवाक
दृष्टि से देखने लगी थी।
वृंदा के हाथ रखते ही छाया को होश आया तो उसके गालों पर सुबह की लाली छा गई थी।
वह कुर्सी से उठी और अपना सिर वृंदा के कंधे पर रखकर धीरे से कहा "यार, इस शरीर में अब जान आ रही है.....!!"
वृंदा, मुस्कराते हुए करुणामयी आँखों से देखते हुए एक ऐसी दुनिया से उसे जुड़ती हुई देख रही थी जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
ननद - भाभी के संबंध नई परिभाषाऐं गढ़ रहे थे ।
कापियां जांचने के बाद वृंदा किचिन से चाय बनाकर, चाय की ट्रे लिए हुए सधे कदमों से कमरे में दाखिल हुई और ट्रे छाया की ओर
बढ़ा दी तथा छाया के गालों को प्यार से स्नेहभाव के साथ छूते हुए ड्राइंग रूम में भेज दिया था ।
सरितकान्त की उंगलियों के बीच में सिगरेट थी।
उनके द्वारा बोला गया हर शब्द जोश से भरा हुआ था, कमरे में उनकी आवाजें गूँज रहीं थीं ।
छाया, सरितकान्त के रहस्यमय व्यक्तित्त्व से आकर्षित होती हुई उनके पास चाय की ट्रे लेकर आई।
अपने पास छाया को आते देखकर सरितकान्त ने आधी जली सिगरेट ऐश ट्रे में बुझा दी थी और उसकी नजर बचाते हुए अपने मुंह
में भरे धुएँ को चुपचाप अपनी छाती में उड़ेल दिया था।
मंत्रमुग्ध कर देने वाले नर्तक के जैसे नाचता हुआ धुआं उनकी छाती के ऊपर फैल रहा था ।
छाया उस धुएँ के सम्मॊहन में बंधी अपने आपको धुंआं ही बनी पा रही थी और उनकी छाती के बालों में लिपटती हुई उनके पूरे
वजूद को अपने में समेटती, भावुक, वशीभूत, उनको अपने कोमल आलिंगन में लपेटती / समाती हुई देखती जा रही थी ।
छाया, सरितकान्त के सामने शरीर से खड़ी थी, पर मन, सरितकान्त को आगोश में लपेटे उसकी गरदन को बार - बार चूमे जा रहा था ।
वह अपने आप को खोती जा रही थी ।
वह खामोशी से बेसुध होती जा रही थी ।
वह बेतहाशा उनके बदन में समाती जा रही थी ।
वह सरितकान्त की धड़कनों को अपनी सांसों में बांधती जा रही थी।
तेजी से धड़कते दिल के साथ जब छाया, सरितकान्त के सामने सेंटर टेबिल पर चाय का कप रखने जा ही रही थी; तभी सरितकान्त
ने उसके हाथों से चाय की प्लेट पकड़ ली जिससे सरितकान्त की अंगुलियां छाया की अंगुलियों से छू गईं ।
उन अंगुलियों के स्पर्श से उसकी सासें थम सी गईं थीं; उसे लग रहा था कि वह अब शरीर में नहीं है ।
सरितकान्त का स्पर्श, छाया के अस्तित्व के हर तंतु में समाता जा रहा था ।
उस स्पर्श से छाया, सरितकान्त के साथ एक होती जा रही थी और जो अप्राप्य उसके लिए दुस्प्रह था; आज साकार होता
दिखाई दे रहा था ।
सरितकान्त के हाथों की गर्माहट को अपने पूरे शरीर पर महसूस करते हुए, उनके सम्मुख होने की स्मृति को बार-बार प्रत्यक्ष
अनुभव कर रही थी।
और उस स्मृति से निकलने वाली अद्भुत ऊर्जित शक्ति से उसके अस्तित्व की प्रत्येक कोशिका को नया जीवन मिल रहा था।
सरितकान्त ने उसके मन के भीतर की गहराईयों में दबा प्यार जगा
दिया था ।
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