अनुभूति-1 [5 (17)] छाया का सरितकान्त को चाय पेश करना
(17)
छाया के दिल के भड़कते / बहकते तूफ़ान से अनजान रौनक, सरितकान्त के साथ अपनी बातचीत में व्यस्त था ।
इस अलौकिक क्षण में छाया, अपने दिल में प्यार की अवर्णनीय अनुभूति लिए, घूमते धुएँ के मादक आलिंगन में लिपटी निःशब्द हो
रही थी ।
जहाँ अनकही और अमुखरित भावनाएं जिनको अभी तक शब्द ही नहीं मिल पाए थे, वह सभी उसके चारों ओर असीम और
शब्दहीन, हवा की जादुई महक से स्पंदित हो रही थी, जो उन्हें वास्तविकता की सीमाओं से दूर स्वप्नलोक में ले जा रही थी जहां शब्द,
अर्थ खो रहे थे ।
इस जगह छाया, नशीले धुएं के साथ एकाकार होती हुई, अपने अस्तित्व को खोते हुए, कामनाओं की ऊंचाइयों के साथ नृत्य कर रही
थी।
धुएँ का प्रत्येक बल उन्हें प्यार के अनकहे रेशमी धागों से शाश्वत आलिंगन में बाँध रहा था ।
छाया की इच्छाएं, नदियों की तरह बहतीं, अपने किनारे सपनों को जुगनुओं की तरह जलाए, उस पल को जागृत होते देख रहीं थीं ।
सरितकान्त की आँखें, मुंह में भरे धुएं को अपनी छाती में उडेलतीं ऊपर उठ रहीं थीं और हाथ चाय की प्लेट के नीचे छाया की
उंगलियों से निबद्ध, शाश्वत परिणय में आबद्ध हो रहे थे।
सरितकान्त भी इन संवेदनाओं से अछूते नहीं थे, उनके अस्तित्व में भी बिजली की एक लहर दौड़ गई थी, भावनाओं की लहरियां
उनकी इंद्रियों को प्रज्वलित कर रहीं थीं।
सरितकान्त की दृष्टि की गहराई में, छाया ने खुद को खोया हुआ पाया - एक अज्ञात देश के यात्री, फिर भी बेहद परिचित।
आकर्षण चुंबकीय था, एक अकथनीय शक्ति जो उन्हें उनकी ओर ऐसे खींच रहीं थीं जैसे कोई पतंगा लौ की ओर अपने आप खिंचा
चला जाता है ।
‘सरितकान्त...!!’
सरितकान्त मुग्ध होकर कह रहे थे -
‘छाया...!!’
छाया के स्पर्श से आल्हादित सरितकान्त, उस क्षण को बार - बार जीने की लालसा कर रहे थे ।
उनका सीना हर सांस के साथ, लयबद्ध नृत्य की तरह गति कर रहा था ।
सरितकान्त की धड़कनों को अपनी सांसों की लय में बांधते हुए छाया, चेतना की उत्कृष्ट समाधि की स्थिति में चली गई थी।
कप में से चाय का घूंट भरते हुए सरितकान्त के शब्द उसे उसी समाधि की अवस्था में गूँजते सुनाई दे रहे थे -"आपने बहुत अच्छी
चाय बनाई, छाया.....!!"
ध्वनि और स्पर्श के अद्भुत समागम ने उसके गालों को गुलाबी रंग में रंग दिया था।
क्षणभंगुर स्पर्श के अनंतकाल के स्वप्न को अपनी पलकों में लिए छाया ने धीरे से कहा – "जी....., पता नहीं कि आपके स्वाद के
मुताबिक होगी कि नहीं.....!!"
कमरे में हल्की रोशनी थी, जिससे दीवारों पर लंबी छायाऐं पड़ रहीं थीं ।
छाया की परछाई रौनक से बोली, उसकी आवाज़ कोमल लेकिन मनमोहक थी,
"आपकी चाय कहाँ रखूँ....?"
"मैं ले लेता हूं...!”
सरितकान्त चाय का घूंट मुंह में भरे हुए छाया के स्पर्श से अभिर्भूत होते हुए चाय के कप से उठती भाप और सुगंध से छाया को
अपने और नजदीक महसूस कर रहे थे ।
छाया, अपने हृदय की कृतज्ञता से वृंदा का आभार व्यक्त कर रही थी जिसने जीवन के अविस्मरणीय पलों को इतना सुखद बनाने में
मदद की थी ।
दरवाज़े के पास खड़ी वृंदा, सरितकान्त और छाया के इस अनूठे संबंध की मूक साक्षी बन रही थी।
Comments
Post a Comment