अनुभूति-1 [5 (15)]छाया की अनुभूति -2
(15)
सरितकान्त के शब्द और भाव एक जादू की तरह थे जिसने छाया को मंत्रमुग्ध कर दिया था और उसने खुद को उनके हर शब्द
पर, उन भावनाओं को महसूस किया था जो उन्होंने इतनी कुशलता से व्यक्त कीं थीं।
बातचीत आगे बढ़ने पर, छाया को एहसास हुआ कि सरितकान्त सिर्फ कहानीकार ही नहीं थे; बल्कि वह ऐसे कलाकार थे जिन्होंने
अपनी ज्वलंत कल्पना और अभिनय कौशल से अपने शब्दों को जीवंत कर दिया था।
अपनी भावनाओं पर काबू न रख पाने के कारण, छाया ने रसोई में एक कुर्सी ले ली थी और ड्राइंग रूम में पर्दे की आड़ में बैठकर
सरितकान्त को चुपचाप देख रही थी ।
पर्दे की ओट में बैठी - बैठी छाया अदृश्य बंधनों से बंधे उनकी आवाज से एकाकार होते हुए उनके दिल को अपने दिल से मजबूती से
बांध रही थी।
वह सरितकान्त की मौजूदगी से उत्पन्न हुए मायाजाल और उनके द्वारा प्रकट की गई ऊर्जा का आनंद ले रही थी।
सरितकान्त की उपस्थिति उसके दिल में एक गीत बन गई थी, और वह उस सुंदर संगीत के लिए आभारी होने से खुद को नहीं रोक
सकी थी जो उसके जीवन में प्रवेश कर चुका था ।
छाया की खामोशी बहुत कुछ कह रही थी -
जो अनकही भावनाओं से बंधी अलौकिक नृत्य में गुंथी हुई.........,
वृंदा के समर्पण और साहचर्य की जीवंत किलकारियों से गुंजित........,
सरितकान्त की हर अभिव्यक्ति को अपने मन में पिरोती हुई........,
उनके बोलने के हर ढ़ंग को आत्मसात करती हुई..........!!!
वृंदा डायनिंग टेबिल पर बैठी अपनी क्लास के बच्चों की कापियां जांच रही थी और थोड़ी - थोड़ी देर में परदे की ओट में कुर्सी में बैठी छाया को देख लेती थी जो सरितकान्त को पूर्णतः अपने में ढ़ालते हुए सरितकान्त और रौनक के बीच की मनमोहक बातचीत को सुनती हुई देख रही थी ।
छाया, सरितकान्त की हर गतिविधि को ध्यान से देख रही थी।
रौनक ने अपनी झेंप मिटाने की कोशिश की – “तब इतना मजा है सिगरेट पीने में........?”
अब सरितकान्त भावुक होकर बोले - “बिल्कुल.....! जिंदगी वैसी नहीं है, जैसी दिखाई देती है। उसे अपने मुताबिक लाने के लिए खुद
को धुआं बनाना पड़ता है और यही धुआं जिंदगी की अपने लिए माकूल तस्वीर बनाता है........!“
सरितकान्त सिगरेट पीकर उसका धुआं नाक और मुंह से छोड़ते हुए सिगरेट के अंगारे के आगे लगी राख को देखते हुए बोल
रहे थे – “जिंदगी की आपाधापी में जब मन थक जाता है न...... ! तब इससे बेहतर रिलेक्सर मूझे नहीं मिलता.....!! शांति का एक
क्षण.......!!! और सबसे अच्छी बात यह है कि यह मुझे अपने लिए कुछ पल बिताने का बहाना भी देता है।“
सरितकान्त के बोलने के अभिव्यंजक तरीके से रौनक हँसा।
वह कहानी कहने में पारंगत थे और अपनी कहानी के प्रभाव को बढ़ाने के लिए उनके पास शब्दों और वाक्यांशों पर जोर देने का
अनोखा तरीका था।
अब सरितकान्त पूरी तरह अपनी रौ में आ गए थे । वह रौनक को अभिनय के साथ बता रहे थे – “देखो मित्र.........! जीवन एक मंच
की तरह है, और हम सभी कलाकार अपनी भूमिकाएँ निभा रहे हैं। जब मैं सिगरेट पीता हूं, तो ऐसा लगता है मानो मैं अपने छोटे से
मंच पर हूं और दर्शकों के लिए प्रदर्शन कर रहा हूं.......!“
छाया ने आश्चर्य से देखा जब सरितकान्त अपने हाथों से दर्शक और मंच को समझा रहे थे।
यह बातें करते - करते वह अपनी आंखों का उपयोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में इस तरह कर रहे थे जिसे शब्द नहीं
पकड़ सकते थे।
उस क्षण छाया को लग रहा था जैसे वह सरितकान्त के साथ मंच पर अपने भौतिक स्वरूप से इतर है और उसका अस्तित्व,
सरितकान्त के प्रखर व्यक्तित्व से प्रकाशित होता जा रहा है और वह छाया न रहकर तेज प्रकाश में बदल रही है ।
वह दोनों प्रकाश पुंज में बदल रहे हैं ।
सभी दर्शक उनकी बनाई दुनिया को देख रहे हैं ।
वह एक दूसरे में समाए अपने पात्रों को जी रहे हैं ।
उनकी चुंबकीय
उपस्थिति ने उसका सब कुछ भूला दिया था, और वह
केवल उन्हें ही देख सकती थी, सुन सकती थी और अपने
चारों ओर उनकी ऊर्जा को महसूस कर सकती थी।
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