अनुभीती-1 [4(13)] वृंदा का छाया में परिवर्तन देखना

 (13)

 

 

वृंदा को छाया में आश्चर्यचकित परिवर्तन देखने को मिल रहे थे ।

वह छाया के व्यक्तित्व में आ रहे बदलावों के परिवर्तन का श्रेय सरितकान्त के प्रभाव को दे रही थी, क्योंकि उसने उनके मधुर 

क्षणों को अपने आखों से देखा था ।

पहले, छाया में आत्मविश्वास की कमी थी। वह आगे की ओर थोड़ा झुककर चलती थी, मानो संसार के भार से दबी हुई हो।

किसी भी बात का निर्णय लेना उसके लिए चुनौतीपूर्ण था और वह अक्सर अपनी राय व्यक्त करने में झिझकती थी, भले ही वह

सही ही हो लेकिन अब, सब कुछ अलग था ।

ऐसा प्रतीत हो रहा था कि छाया में खोया हुआ आत्म-विश्वास आ रहा था।

वह अब सिर ऊंचा करके चलने लगी थी।

उसने विभिन्न मामलों पर अपनी राय व्यक्त करना शुरू कर दिया था ।

उसकी प्रतिक्रियाएँ त्वरित और सारगर्भित होने लगीं थीं ।

वृंदा अपनी सहेली की उन्नति और परिवर्तन देखकर बहुत रोमांचित हो रही थी।

हालाँकि उनकी बातचीत ज्यादातर सामान्य होतीं थीं, लेकिन यह स्पष्ट था कि छाया, सरितकान्त के साहचर्य के अनुभव से निखरकर 

अपने मन में दबी भावनाओं को व्यक्त कर रही थी।

 वृंदा, सरितकान्त से भी प्रभावित थी कि उसने छाया के देखने के नजरिए को भी बदल दिया था । इस नये आत्मविश्वास के साथ छाया 

रोजमर्रा के काम भी खूबसूरती से निपटाने लगी थी।

समय बीतने के साथ वृंदा और छाया की दोस्ती और भी मजबूत होती जा रही थी।

यह जानते हुए कि छाया के व्यक्तितत्व परिवर्तन के पीछे सरितकान्त हैं; एक दिन वृंदा ने कौतूहल वश छाया से उसके जीवन में 

सकारात्मक बदलाव के बारे में पूछ ही लिया।

छाया ने मुस्कुराते हुए बताया – “प्रत्येक स्त्री जितनी बाहरी तौर पर सुंदर होती है, उतनी ही सुंदर आतंरिक तौर पर भी होती है; यह 

तो उसके पति / साथ के पुरुष का कार्य है कि वह स्त्री की दोनों तरफ की सुंदरता को निखारे,उसमें आत्मविश्वास भरे......!“

वृंदा की आंखों में देखती हुई छाया कहती जा रही थी – “वृंदा, तुम्हें शादी के बाद पता चलेगा कि पति उसके जीवन को किस तरह 

प्रभावित करता है; चाहे वह आत्मिक रूप से हो या शारीरिक रूप से........!!  मैं तुम्हें कैसे समझाऊं.......! खैर......!  सरितकान्त के 

मिलने से न केवल मुझे जीवन की सुंदरता दिखाई दे रही है बल्कि मैं खुद पर और अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने के लिए उत्साहित भी हो रही हूं.... !“

सरितकान्त ने छाया की विराट क्षमता को परखते हुए उसके टूटते विश्वास को वापिस लाने के लिए छाया के भीतर एक चिंगारी 

प्रज्वलित कर दी थी, जिसे वह अपने आप में खुद को टटोलकर, दुर्बल मन से बाहर निकलने और आत्मविश्वास के साथ दुनिया में 

भरपूर जीने के लिए प्रेरित हो रही थी ।

सरितकान्त ने छाया को सिखा दिया था कि प्रत्येक व्यक्ति में अद्वितीय ताकत होती है, जिन्हें निडर होकर अपनाना आवश्यक है।

छाया के इस तरह के परिवर्तन से वृंदा बहुत प्रसन्न हुई थी ।

वह अपनी सहेली के जीवन में उत्प्रेरक बनने के लिए सरितकान्त के प्रति आभारी महसूस कर रही थी।

उनकी दोस्ती और गहरी हो गई थी, क्योंकि वृंदा ने न केवल छाया की प्रगति की प्रशंसा की, बल्कि उसने अपने आपको जानकर

अपनी नैसर्गिक विशेषताओं को उभारकर और कमियों को दूर करके सकारात्मक परिवर्तन को अपनाने की दृढ़ता भी सीख ली थी ।

उस दिन से, वृंदा और छाया का बंधन और मजबूत हो गए थे । वह दोनों एक-दूसरे को प्रेरणाऐं दे रहे थे ।

वृंदा, छाया के आत्मविकास, प्रेम और अपने मन को समझने की खूबसूरत यात्रा की सहयोगिनी बन रही थी साथ ही उनके मधुर पलों

 की मूक साक्षी भी।

Comments

Popular posts from this blog

अनुभूति-1 [6(22)] होटल सम्राट में वृंदा और छाया द्वारा सरितकान्त का आमंत्रण

अनुभूति-1[7(25)] छाया और सरितकान्त की बातचीत

अनुभूति-1 [5(14)] सरितकान्त का विशेष अदा से सिगरिट पीना