अनुभूति-1 [4(12)] छाया का सरितकान्त के जैसे अभिनय

 (12)

 

रौनक और सरितकान्त जाने के जाने के बाद वह अपने आपे में नहीं थी ।

वह पूरी तरह सरितकान्त के ही व्यक्तित्व में रंगी अपने आपको सरितकान्त ही समझ रही थी ।

वृंदा और तन्मय अभी अपने स्कूल से नहीं आए थे और रोहिणी अपने कमरे में थी।

छाया, सरितकान्त की ही प्रतिकृति बनते हुए उनके जैसे ही अपने घर के गेट से ड्राइंग रूम के दरवाजे पर आई और उनकी ही 

तरह कातिल अदा से मुस्कराते हुए अपने सामने खड़ी आभासी छाया को नमस्कार करने लगी जबकि उसके सामने उस समय 

कोई नहीं था और नमस्कार करने के बाद वह उनकी ही तरह सोफ़े पर बैठ गई थी ।

वह आभासी रूप में अपने सामने बैठे रौनक से बातें कर रही थी और सरितकान्त के जैसे ही उसने सेंट्रल टेबल पर पड़ी सिगरेट 

की डिब्बी से सिगरेट भी जला ली थी और उन्हीं की तरह ही पीने लगी थी ।

पर आश्चर्य कि पहली बार सिगरेट पीने पर भी वह बड़ी कुशलता से सिगरेट भी पी रही थी ।

इसी बीच वह उन दोनों के नाश्ता लेकर आई ।

नाश्ता लाते समय उसे देखकर सरितकान्त के जैसे व्यवहार थे ठीक उसी तरह ही वह अभिनय कर रही थी और आभासी रूप 

से छाया की लाई हुई ट्रे में से नाश्ते की प्लेट भी उठा रही थी ।

नाश्ता करते समय जिस मनुहार से वह सरितकान्त को नाश्ता परोस रही थी और वह मना करते जा रहे थे ठीक उन्हीं की तरह 

वह आभासी रूप से छाया को भी मना कर रही थी ।

जब रौनक ने उसके बनाए नाश्ते की तारीफ सरितकान्त को देखते हुए की थी तो सरितकान्त के चेहरे पर नाश्ते के स्वाद की 

चरम संतुष्टि के जो भाव उनके चेहरे पर आए थे; ठीक वही भाव स्वाभाविक रूप से छाया के भी चेहरे पर आ गए थे ।

अब वह पूरी तरह सरितकान्त ही बन चुकी थी नाश्ते के बाद जिस स्वाभाविकता से अपनी विशिष्ट शैली में सिगरेट जलाते थे; 

ठीक उन्हीं की ही तरह उसने भी सिगरेट जला ली थी और उन्हीं के जैसे बड़े और गहरे कश लेते हुए पीने लगी।

संयोग से उसी समय वृंदा स्कूल से आ गई थी ।

उसे सिगरेट की महक गेट के अंदर आते ही महसूस हो गई थी लेकिन ड्राइंग रूम से कोई आवाज न आने के कारण वह चुपचाप

 परदे को एक किनारे करते हुए अंदर देखने लगी जैसे ही उसने अंदर का दृश्य देखा तो उसके होश उड़ गए थे ।

छाया तरन्नुम में बैठी सरितकान्त के जैसे ही सिगरेट पी रही थी और उसी समय उसने सरितकान्त के जैसे ही ठहाका भी लगाया था ।

उसके बाद वह तुरंत उठ गई और अपने सामने काल्पनिक बैठे रौनक से सरितकान्त के ही स्वर में जाने की इजाजत मांगी और 

बाहर जाने वाले दरवाजे की ओर जाने लगी थी ।

यह देखकर वृंदा की हालत खराब हो गई थी । वह अपनी प्यारी भाभी के मुंह से मर्दाना स्वर में सरितकान्त के जैसे हंसी और

 आवाज सुनकर सकते में आ गई थी, वह अपनी जगह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।

सरितकान्त के ही जैसे चलते हुए वह ड्राइंग रूम के गेट तक आई और उनके जैसे ही कातिलाना अदा से मुस्कराते जाने को 

हुई पर आगे न जाकर अब वह वहीं ठहर गई थी ।

थोड़ी देर तक खड़े रहने के बाद अपनी ही स्वाभाविक चाल से चलते हुए सोफ़े पर अपनी आंखें बंद करके बैठ गई और अपना 

सिर उसके पुस्त पर टिका लिया था ।

कुछ देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद उसके आंखों से आँसू बहने लगे थे; वृंदा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह उसके पास जाए ।

वह छाया को सोफ़े पर बैठे हुए आँसू बहाते देख रही थी तभी आँगन का गेट खुलने की आहत हुई तन्मय भी स्कूल से आ चुका था ।

वृंदा छाया को उसी स्थिति में छोड़कर अपने मन में हजारों सवाल लिए अपने कमरे की ओर चली गई ।

तन्मय नए उसे सोफ़े पर बैठे देखा तो वह पूछ बैठा – “तबीयत तो ठीक है न मम्मी.....!“

“हां बेटा..... सिर भारी हो गया था.......!!”

“अभी ठीक हैं .......!!”

“हां .....बेटा.......!!” कहते हुए छाया एक बड़ी लंबी से अंगड़ाई लेकर उठ गई और किचिन की ओर चली गई।

 

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