अनुभूति-1 [4(11)] सरितकांत से मिलने पर छाया की अनुभूति

 (11)

 

सरितकान्त को सिगरेट पीने की आदत थी, लेकिन उनके घर में, खासकर उनकी पत्नी कमलेश द्वारा इस पर सख्त प्रतिबंध था।

उनकी बार-बार की मिन्नतों और चेतावनियों के बाद भी सरितकान्त इस आदत को छोड़ नहीं पा रहे थे ।

इसके वावजूद, वह घर के बाहर लापरवाही से सिगरेट पीते थे, और इसे अपने परिवार से छुपाने की कोशिश भी करते थे।

दूसरी ओर, वह सरितकान्त की धूम्रपान की लत से उसके स्वास्थ्य में पड़ने वाले दुष्परिणामों से चिंतित थी और शायद उनके 

उथल-पुथल भरे पारिवारिक जीवन से भी ।

कमलेश भी उनको बार-बार अपने बच्चों सुबोध और कनक की दुहाई भी दे चुकी थी जिससे वह कुछ दिन तो सिगरेट नहीं पीते थे 

पर फिर पीने लगते थे।

कभी - कभी छाया के मन में सरितकान्त की खुशमिजाजी को लेकर संशय उत्पन्न होता था  कि वह अपने प्रति इतने लापरवाह 

क्यों हैं और क्यों बेतहाशा सिगरिट पीते हैं?

आज भी कुछ अलग नहीं था; सरितकान्त अपने आकर्षण और चुंबकीय व्यक्तित्व को लेकर उपस्थित हुए थे। उनके आने की 

खुशी में छाया स्वाभाविक रूप से बहुत खुश और उत्साहित महसूस कर रही थी।

मानो उसकी रग-रग में उत्साह और उल्लास का सागर उमड़ रहा हो ।

वह अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक जीवंत, ऊर्जामई, दीप्तिमान और उल्लेखनीय रूप से सुंदर महसूस कर रही थी।

रौनक ने, सरितकान्त के आने पर छाया के व्यवहार में बदलाव भी देखा था । हालाँकि, घर की महिलाओं के रीति-रिवाजों और आदतों से परिचित होने के कारण, जब घर में कोई मेहमान आते हैं तो घर की स्त्रियों की स्वाभाविक प्रकृति जानकर घर के पुरुष उनके व्यवहार पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं ; यही सामान्य गुण रौनक में भी था ।

सरितकान्त, ड्राइंग रूम के सोफ़े पर बैठे थे ।

उनकी रौनक से बात करने की आवाजें किचिन तक पहुच रहीं थीं।

सरितकान्त की उत्साहपूर्वक और विशेष शैली में बात करने की विशेषता से उसका दिल उत्साह और उमंग से भर रहा था।

सरितकान्त की चुंबकीय वाणी से आप्लावित छाया ने बहुत रुचि से सरितकान्त और रौनक के लिए नाश्ता तैयार किया था जिसे 

बड़ी ट्रे में रखकर ड्राइंग रूम की ओर चली गई थी जहाँ सरितकान्त और रौनक बैठे थे; जैसे ही वह पास आई, सरितकान्त ने 

सम्मान और कृतज्ञता की मुद्रा में हाथ जोड़कर उसका स्वागत किया।

उनके हाथों को नमस्कार की मुद्रा में और उनके चेहरे पर दिल को चीर लेने वाली कातिल मुस्कराहट को देखकर छाया को 

अपने भीतर असंख्य तरंगों  का ज्वार उमड़ता जान पड़ा था।

उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह किसी दैवीय शक्ति की उपस्थिति में खड़ी थी, और उसके चुंबकीय प्रभाव से उसकी ओर 

आकर्षित हुई जा रही थी।

इस आकर्षण में उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका पूरा अस्तित्व ही सरितकान्त की नमस्कार की मुद्रा की दोनों हथेलियों के बीच 

में है, और वह उनकी ऊर्जा को आत्मसात कर रही है ।

उनके प्रति उसका लगाव सीमाओं के भी पार जाने की जिद कर रहा था और अनगिनत जन्मों से उनका साथ पाने के लिए आकांक्षित 

था।

छाया, सरितकान्त के सामने एक मूर्ति की तरह खड़ी थी, उसे लग रहा था जैसे समय रुक गया हो और उसी में स्थिर होकर, वह 

सरितकान्त को अपलक, स्नेह भरी आँखों से देखे जा रही थी।

सरितकान्त की देह गंध से अभिर्भूत, उनके शरीर के औरा से अपने शरीर के औरा का मिलान कराती हुई - अपने विचारों में 

खोई हुई, वह वहीं खड़ी थी। उस पल में, उसे सरितकान्त के साथ एक जुड़ाव महसूस हो रहा था, जो सामान्य रिश्तों की सीमाओं को पार कर रहा था।

 छाया को होश आने पर हाथों में पकड़ी ट्रे को सरितकान्त और रौनक के सामने सेंटर टेबल पर रख दिया था ।

उसने नाश्ते की प्लेटें बहुत सावधानी से लगानी शुरू कीं, लेकिन उसकी आँखें सरितकान्त को बिना देखे ही उनके चुंबकीय बदन 

पर चिपकीं थीं, जिन्हें हटा पाना उसके वश में नहीं था ।

हालाँकि उसने अपना संयम बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन छाया का दिल उन भावनाओं से उमड़ रहा था जिन्हें उसने

 पहले कभी अनुभव नहीं किया था।

उसे ऐसा लग रहा  था जैसे उसके अस्तित्व का रोम – रोम, सरितकान्त से जुड़ रहा था, और उनकी उपस्थिति ने उसकी आत्मा में 

लौ जला दी थी।

छाया ने अपनी आँखें पूरी तरह उठाए बिना ही सरितकान्त की ओर मन की आंखों से अपने आपको देखते हुए पाया, जैसे उसे 

डर था कि उनका अद्वितीय सघन स्नेह, उसकी गहरी काली आंखों से कहीं छलक न जाए ।

यह पल छाया के जीवन में मधुर स्मृति की तरह अंकित हो रहा था जिसमें वह सरितकान्त की उपस्थिति में अपने अंदर जन्मों से 

सोई हुई नारी को उद्वेलित कर रही थी ।

नारी सिर्फ तन से ही नारी नहीं होती है बल्कि अपने मन - प्राण और शरीर के हर अंग से मुखर होकर प्रगट होना चाहती है और 

यही प्रगटन नारितत्व की पहचान होती है ।

हर किसी स्त्री के जीवन में यह क्षण हैं जिन्हें समझने की आवश्यकता है।

पुरुष के सामीप्य से नारी में जो रक्त संचार होता है वह उसे, उसके शरीर की पूर्णता की ओर ले जाता है जिसमें वह बाह्य और 

आंतरिक रूप से नारी के आदर्श स्वरूप को पाती है और यह, हर स्त्री का अधिकार भी है । (स्त्री हार्मोनों का समुचित 

संचरण – (Regulation of Feminine Hormone)

‘’लीजिए न .......!!” बहुत ही मनुहार से छाया ने सरितकान्त से कहा – “शायद यह आपको पसंद आ जाए.....!!’’

छाया ने ट्रे में से मिठाइयाँ निकालकर सरितकान्त की प्लेट में जैसे ही रखीं; वह सरितकान्त की ओर देखने से खुद को नहीं रोक सकी 

थी ।

उसका दिल गहरे प्यार से भरा हुआ था, एक ऐसा प्यार जो उसकी आत्मा की गहराई से तक्षण निकलने को आतुर हो रहा था।

सरितकान्त मुस्कुराते हुए उससे कह रहे थे – ‘’अरे...... नहीं भाभी जी...!! यह बहुत ज्यादा हो जाएगा....! आपने नाश्ता भी तो 

बहुत स्वादिष्ट बनाया है.....!!’’

छाया उनकी प्रशंसा पर सरितकान्त की ओर स्नेह मिश्रित आकर्षित आँखों में ख़ुशी और शर्मिंदगी छुपाने की कोशिश करते हुए 

परोसती रही ।

रौनक चिढ़ाते हुए कह रहे थे – ‘’छाया, तुमने आज गजब ही कर दिया है बहुत मेहनत की है......?’’

छाया अपनी भावनाओं को छिपाने की कोशिश करते हुए कहने लगी –‘’कहां....! यह तो  रोज का ही तो नाश्ता है.....!!’’

स्वादिष्ट नाश्ते के साथ - साथ  उनकी बातचीत भी विशिष्ट हो रही थी जो स्वाभाविक ही था ।

नाश्ता खत्म होने के बाद आदत के मुताबिक सरितकान्त ने सिगरिट जला ली थी और उसका पैकेट सेंट्रल टेबल पर ही रख दिया था ।

वह अपने तरन्नुम में सरितकान्त पीने लगे थे साथ ही रौनक से भी बातें करते जा रहे थे ।

जब छाया प्लेट लेने के लिए उस कमरे में आई तो उनकी नज़रें आपस में मिल गईं;  छाया उस पल में ही स्थित हो गई हो जैसे -

उसे ऐसा लगा जैसे समय ठहर गया हो, और उसके आस-पास की दुनिया फीकी पड़ गई हो।

उसका व्यक्तित्व सरितकान्त के व्यक्तित्व में पूर्णतः आबद्ध होता जा रहा था ।

वह सरितकान्त के चुंबकीय प्रभाव में आ चुकी थी और खुद से सवाल करने लगी –

‘यह कैसा एहसास है.........?

मुझे कभी पहले महसूस नहीं हुआ........?

यह क्या है......

मैं समझ नहीं पा रही हूँ..........? ‘

वह अपने आपको सरितकान्त के व्यक्तित्व में खोती हुई देख रही थी ।

वह जितना अधिक देखती, उतनी ही अधिक उसे तृप्ति और संतुष्टि की अनुभूति हो रही थी।

उनकी बात करने की अदा के साथ शब्दों को विशेष प्रभाव से बोलने की कला उसके मनस्थल में स्थाई होते जा रहे थे।

वह उनकी बातचीत के हर भाव, हर स्वर को आत्मसात कर रही थी और खुद को उनकी प्रतिकृति बनाती जा रही थी । 

उसके मन में सरितकान्त के ही स्वप्न चल रहे थे; जबकि सामने वह प्रत्यक्ष ही थे।

स्वप्न और प्रत्यक्ष के सेतु पर खड़ी छाया को केवल ध्वनियां ही सुनाई दे रहीं थीं ।

वह ध्वनियां जो गहरी खाईयों से आतीं हुईं उसके कानों में गूंज रहीं थीं ।

उसकी तंद्रा तब भंग हुई जब रौनक ने उसे पुकारा और वह अपनी आंखों में सरितकान्त के सपने लिए हुए उनके सामने खड़ी हो गई

 थी ।

सरितकान्त को आवश्यक काम आ जाने के कारण वह बिना चाय पिए ही जाने लगे थे ।

रौनक उसे सरितकान्त के जाने की सूचना दे रहे थे और सरितकान्त अपने चेहरे पर दिल जीतने वाली मुस्कान लिए अभी तक के 

विशिष्ट आतिथ्य का धन्यवाद देते हुए अपने दोनों हाथ जोड़कर उससे जाने की अनुमति ले रहे थे ।

पर अब वह सरितकान्त की उपस्थिति से भी बेखबर थी ।

जब रौनक और सरितकान्त जाने लगे तो छाया, सरितकान्त की प्रतिकृति बनी हुई वैसे ही भाव और आभास के साथ अपने चेहरे 

पर उनके जैसी ही मुस्कान लेकर उनके साथ अपने विशेष संबंध के लिए आभारी महसूस किए बिना नहीं रह सकी थी।

अनुभूतियों की अनंत परतों के पार से जब छाया वर्तमान में आई तो सरितकान्त की दीप्ति से प्रकाशित, ख़ुशी से झूमती हुई,  

रोम - रोम से खिली हुई, इस समय को अपने जीवन की अनमोल संपत्ति बना रही थी ।

अपने जीवन में असीम प्यार और स्नेह भरते हुए सर्वथा नवीन और गूढ़ रिश्ते पर इठलाती हुई छाया, इस गुजरे पल को 

फ़िर - फ़िर जीने लगी थी ।

 



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