अनुभूति-1 [3(9)] वृंदा का दुकान में बैग भूलना
(9)
वृंदा अपना बैग लेकर वापस आ गई थी, उसकी सांसें उखड़ी हुईं थीं । उन दोनों को जब उसने इस दशा में देखा तो भौचक्की सी खड़ी
रह गई थी ।
वह आश्चर्यचकित सी उन दोनों को बारी-बारी से देखती जा रही थी । उनको उसके आने का भान भी नहीं हुआ पर जब काफी देर
हो गई तो उसने दरवाजे के पास के स्टूल पर रखे गमले को नीचे गिरा दिया, जिसकी आवाज से दोनों चौंक गए थे।
छाया, होश में आने के बाद शरमा गई थी; साथ ही वृंदा को सामने खड़े पाने पर वह बुरी तरह झेंप भी गई थी ।
सरितकान्त ने छाया के चेहरे में अचानक हो रहे इन बदलावों को बहुत ही गौर से देखा और नोटिस किया कि वह लोग कितने करीब
आ चुके हैं और उनका एक राजदार भी बन गया था जो वृंदा थी ।
अपनी झेंप मिटाने के लिए सरितकान्त ने वृंदा से कहा – “बहुत तेजी से आप कहीं भाग गई थीं.........!”
वृंदा ने उन दोनों को मुस्कराते हुए अपनी कुर्सी पर बैठते हुए कहा – "जी...! बैग भूल गई थी.......! दुकान के काउंटर में ......!! "
"मिल गया ......!! "
"जी .....मिल गया ......!!"
"चलो बैठो......!! कोई बात नहीं, मिल तो गया न......!!
"हां भाभी......!" और उसने सरितकान्त की ओर मुस्कुराते हुए देखकर कहा – "मिल गया......!!" और जोर से हंसने लगी; उसकी
हंसी में शरारत झलक रही थी ।
छाया ने भी शरमाकर हंसते हुए वृंदा को देखा और फिर सरितकान्त को देखकर लजा गई थी ।
सरितकान्त ने छाया के इस प्रकार देखने की अदा को अपने दिल में हमेशा के लिए सजो कर रख लिया था; वह पल जिंदगी भर
के लिए उनकी बहुमूल्य संपत्ति बन चुका था ।
आल्हादित छाया उनको स्वर्ग का सा एहसास करा रही थी ।
वह तीनों फ़िर बातों में मशगूल हो गए थे ।
तब एक सरितकान्त ने फ़िर गर्म काफ़ी का आर्डर दे दिया जिसे सुनकर वह अपनी सीटों से उठने लगीं थीं पर सरितकान्त ने
किसी तरह उनको मना ही लिया था ।
भरपूर तसल्ली के साथ उनका आज का मिलन हुआ जिसकी खुश्बू लेकर उन लोगों ने एक दूसरे से जाने की इजाजत मांगी ।
किसी का मन तो नहीं कर रहा था कि जाएं पर वह विवश थे कि जाना पड़ रहा था।
सरितकान्त और छाया ने हाथों में हाथ लेकर, एक दूसरे की आंखों में देखते हुए एक दूसरे को मौन विदाई दी। उन दोनों के बीच
खड़ी वृंदा, साक्षी बनी मुस्कराती हुई, उनको देखती जा रही थी ।
सरितकान्त के साथ इस अप्रत्याशित मुलाकात ने छाया के मन में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ा दिया था जिससे उनके बीच
विकसित होते संबंधों को और बल मिलने लगा था ।
उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह आकस्मिक मुलाकात, भविष्य में न जाने और कितने ऐसे क्षणों को जन्म देने के
लिए आतुर हो रही थी।
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