अनुभूति -1 [3(7)] बाजार में छाया और वृंदा की सरितकान्त से मुलाकात
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जैसे-जैसे समय बीत रहा था, विनय प्रकाश और रौनक का परिवार शादी की तैयारियों में व्यस्त हो रहा था ।
वृंदा, एक उत्साही और स्वतंत्र विचारों वाली लड़की थी लेकिन परपंराओं और मान्यताओं को भी उतना ही महत्त्व देती थी साथ ही
संबंधों को भरपूर निभाना उसे आता था और उन पर मिटना भी ।
अपने मन में चल रही उमंग, साहचर्य, विछोह भरी असंख्य भावनाओं को वह कैनवास पर उकेरने के लिए जानी जाती थी; जिसे
उसने अपनी जीवंत पेंटिंग्स् के माध्यम से व्यक्त भी किया था।
वृंदा की शादी की तैयारियों के सिलसिले में छाया और भी ज्यादा व्यस्त थी । इसी सिलसिले में एक दिन वह वृंदा के साथ बाजार गई
थी जहां पर सरितकान्त अपने कंस्ट्रक्शन के काम में आने वाले कुछ सामान खरीदने के लिए बाजार में आए थे और अपनी तलब एक
वशीभूत दुकान के बाहर सिगरिट पी रहे थे ।
उसी इलाके में बैंक होने के कारण उनका कुछ बैंक भी काम था।
संयोग से उनकी वहीं पर छाया और वृंदा से मुलाकात हो गई थी। उनके इस तरह अचानक मिलने से हतप्रभ गईं थीं।
उनके इस तरह अचानक मिलने से उन दोनों के चेहरों में आई लावन्यता देखकर सरितकान्त को बहुत आनन्द आया खास तौर पर
छाया को; जो उनसे मिलकर लाज के मारे दुहरी हुई जा रही थी ।
सरितकान्त बात प्रारंभ करने के उद्देश्य से उन दोनों के चेहरों को बराबर देखते हुए बोले -
"कैसे हैं आप लोग....?” कहते हुए उन्होंने अपने हाथों में पकड़ी सिगरेट बुझा दी थी ।
कहकर वह छाया की ओर देखने लगे थे पर छाया इतने दिनों के बाद मिलने के कारण कृत्रिम रूप से रूठने के अंदाज में उनसे मुंह
फ़ेरकर खड़ी हो गई थी ।
सरितकान्त, छाया की इस अदा पर बार - बार निहाल होकर उसके ऊपर सब कुछ लुटा देना चाहते थे ।
वह छाया कि गिरती - उठती पलकों को देखते हुए अपने आपको भाग्यशाली मान रहे थे जिससे गर्व से उनका सीना चौड़ा हो रहा था ।
लेकिन रूठे रहने पर भी इतने दिनों के बाद सरितकान्त की आवाज सुनकर छाया के चेहरे पर लालिमा आ गई थी और मौन स्वीकृति
में छाया ने अपनी नजरें झुका लीं थीं, पर वृंदा चहकते हुए छाया और सरितकान्त की ओर देखते हुए मुस्कराई और बोली -
“जी...... वो.... वो....... बस ऐसे ही कुछ जरूरी काम था इसलिए बाजार आए थे ...... !’’
वृंदा ने आदर के साथ छाया को देखते हुए उनकी बात का उत्तर दिया ।
सरितकान्त भी छाया को देखते हुए नहीं अघा पा रहे थे -
"अद्भुत.....! मैं सोच सकता हूं......!! लेकिन वृंदा, मुझे तुम्हारे भाग्य से ईर्ष्या होने लगी है......!!"
कहकर जोरदार उन्होनें जोरदार ठहाका लगाया जिससे छाया के बदन में रोमांच की लहर दौड़ गई थी पर वृंदा सरितकान्त की ओर
सवालिया निगाहों से देखने लगी थी ।
उसे अपनी ओर इस तरह देखकर सरितकान्त मुस्कराते हुए कहा –
"वो इसलिए कि तुम हमेशा छाया जैसी दोस्त के साथ रहती हो.....! काश.....!! मुझे भी यह मौका मिल पाता......?"
"ओह..... !!"
कहकर वृंदा अपनी भाभी छाया की ओर गर्व से देखने लगी थी ।
सरितकान्त ने उन दोनों को अपने साथ काफ़ी पीने के लिए आग्रह किया जिससे वह दोनों असमंजस में पड़ गईं थीं, पर सरितकान्त के
जोर देने पर वह लोग मान गईं थीं ।
वह लोग पास ही के एक रेस्ट्रारेंट के प्राइवेट फ़ैमिली केबिन में चले गए थे ।
बैरा ने उनकी टेबिल में पानी की तीन गिलासें रखकर आर्डर पूछा ।
छाया और वृंदा न - न कहते रह गए थे पर सरितकान्त ने अपनी ओर से लाइट स्नेक्स और काफ़ी का आर्डर दे दिया।
वह तीनों, एक-दूसरे से शौक और परहेज के बारे में जानते हुए चुहलबाजी के तौर पर बहुत सारी बातें कर रहे थे।
अब तक सरितकान्त और छाया एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे ।
तब तक बैरा उनका आर्डर लेकर आ गया था और टेबिल पर सजाने लगा था ।
स्नेक्स को मुंह में रखते ही जैसे वृंदा को अचानक ध्यान आया कि वह अपना बैग पास ही की दुकान में भूल आई थी; वह ‘’एक्सक्यूज
मी......!‘’ कहकर छूटी गोली की तरह फ़ैमिली केबिन से उस दुकान की ओर भाग गई थी।
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