अनुभूति - 1 [1(5)] वृंदा और अनिमेष की शादी की बातचीत
(05)
दुल्हन को आते देखकर कुर्सियों में बैठीं सभी महिलाएं उठ गईं थीं और दुल्हन के पीछे - पीछे जयमाला मंच की ओर चल पड़ीं थीं ।
दुल्हन के ऊपर सभी लोग फ़ूलों की बारिश करने लगे थे तब तक दुल्हन संजना जयमाला मंच के ऊपर पहुच गई थी ।
सरितकान्त का बेटा सुबोध, रंजन लोहित की पत्नी आरती उनके बेटा - बेटी जय और सिया के साथ - साथ ही जयमाला देख रहे थे ।
सरितकान्त और छाया एक दूसरे से अपरिचित, एक दूसरे को न जानते हुए भी मन से बंधते हुए मौन संवाद कर रहे थे और इतने
शोर - शराबे के बीच भी एक दूसरे की धड़कनों को सुनने का प्रयास कर रहे थे ।
कुछ समय बाद जब डॉक्टर तारिका की नजर छाया पर पड़ी जो सरितकान्त के साथ इस पल को संजोए खड़ी थी, वह जल्दी से छाया
का हाथ पकड़कर मंच के ऊपर ले गई और उसके साथ रौनक, तन्मय और वृंदा भी साथ में फ़ोटो खिंचवाने लगे थे ।
मंच के ऊपर जब छाया, सरितकान्त के सामने खड़ी हुई थी तो अपने सामने सर्वांग सुंदरी अप्सरा जैसे स्वरूप में देखकर वह अपने
आप को खोते जा रहे थे ।
छाया भी पिघलती सी अपने आप में समेटती सामने खड़ी थी ।
उसी समय रजंन लोहित ने उन्हें आगे की तैयारियों के लिए, बुला लिया था जिसे थोड़े समय में पूरा करके वह आ गए थे ।
अपने सामने सरितकान्त को न देखकर छाया बेचैन सी हो गई थी और सभी जगह टटोलती आंखों से ढूढने लगी थी ।
कुछ समय बाद सरितकान्त को अपने सामने पाकर वह पुनः खिल गई थी ।
साथ में खड़ी वृंदा उनके चक्षु - परिणय की मूक साक्षी बनकर इस समय को संजोते जा रही थी।
वर - वधु को आशिर्वाद देकर वह सभी मंच से नीचे उतरे तभी गंगापंत ने उन सब लोगों को भोजन करने का आग्रह किया ।
सभी एक साथ खाने के स्टालों की ओर जाने लगे ।
खाना खाते - खाते आपस की बातचीत के दौरान सरितकान्त को पता चला कि छाया के नाना भी उसके अपने शहर रतननगर के हैं।
आठवीं कक्षा तक छाया अपने नाना – नानी के घर की गर्मी की छुट्टियां बिताती थी पर सरितकान्त, पांचवीं के बाद से ही उस शहर से
जा चुके थे और अभी तक वापस नहीं जा पाए थे।
इन सब बातों के दौरान वह सब लोग आनन्द - विनोद से खाना खा रहे थे ।
इस बीच कई बार छाया ने बहुत ही नजाकत से सरितकान्त की ओर देखने के लिए अपनी पलकें उठाईं पर भरपूर नजरों से
सरितकान्त को देख नहीं पा रही थी।
सरितकान्त को भी एहसास हो चुका था कि छाया की नजरें उसे टटोल रहीं थीं पर छाया के जैसे ही वह भी उसकी ओर भरपूर
नजरों से देखने के लिए हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
खाना खाने के बाद वह सभी उठ गए थे ।
गंगापंत और विनयप्रकाश जो बचपन के अभिन्न मित्र थे सोफ़े पर बैठे थे , उनके परिवार में उनकी पत्नि दीर्घा, पुत्र अनिमेष और पुत्री अन्वेषा
आदि खाना खा रहे थे।
यह संयोग ही था कि यह सब लोग खाना खाकर एक साथ ही उठे थे; तब गंगापंत ने विनयप्रकाश के परिवार से रौनक के परिवार
का परिचय कराया।
बातों - बातों में अनिमेष की शादी की चर्चा चलने लगीं थीं ।
रौनक को अनिमेष बहुत भा रहा था वह वृंदा के लिए ऐसे ही वर की तलाश में था ।
अपने मन के मुताबिक लड़का मिलने के बाद उसकी उत्सुकता अनिमेष के परिवार से शादी की बातें करने के लिए बढ़ गईं थीं
अतः उसने अपने निर्णय में छाया को शामिल किया और वह उससे बातें करने लगा था।
छाया ने अनिमेष को भी देखकर एक नजर में पसंद कर लिया था पर वह अभी तक किसी निर्णय पर नहीं पहुचे थे।
एक सामान्य औपचारिक बातचीत ही वह लोग कर पाए थे ।
पर दोनों पक्षों के लोग एक दूसरे से संतुष्ट नजर आ रहे थे।
इस तरह खुशियों और आनन्दपूर्ण समारोह के साथ - साथ दूसरी शादी के पक्की होने की खबर परिसर के आयोजन स्थल में आग
की तरह फ़ैल गई थी।
सभी अपने - अपने काम से समय निकालकर भावी वर और वधू को आर्शिवाद देने आने लगे थे।
रौनक और विनयप्रकाश जी ने वृंदा और अनिमेष की शादी पर चर्चा करने के लिए एक शुभ दिन पर मिलने का फैसला किया।
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