अनुभूति 1 [1(4)] छाया और सरितकान्त का पहली बार पास आना
(4)
अपनी बहुत सारी सखियों के साथ जब दुल्हन का आगमन हुआ तो उपस्थित सभी लोग उसकी एक झलक देखने के लिए बेताब हो रहे थे
पर वह वरमाला लिए अपने ऊपर वितान ताने सहबालाओं और अपनी सहेलियों के बीच में थी ।
दुल्हन संजना के साथ सरितकान्त की पत्नी कमलेश और कनक तथा उसकी सहेलियों के अलावा पीछे - पीछे सरितकान्त भी दुल्हन की
सहेलियों के साथ सबसे पीछे चल रहे थे, जो संजना के धर्म के भाई थे।
तभी डाक्टर तारिका ने उनके कान में कुछ कहा जो उन्हें शोर में सुनाई नहीं दिया और उसी समय छाया, सरितकान्त के साथ-साथ
अञ्जाने ही चलने लगी थी ।
वृंदा भी उनके साथ - साथ चल रही थी, जिसे देखकर डाक्टर तारिका बहुत ही गर्व महसूस कर रहीं थीं ।
तभी दुल्हन के ऊपर के वितान के चारों कोने में से एक साथ दो कोने, सखियों के हाथों से छूटने के कारण छाया और सरितकान्त उस
वितान में पूरी तरह ढक गए थे ।
अचानक हुई इस घटना से वह दोनों हत्प्रभ रह गए थे, पर सखियों ने जल्दी से उन कोनों को दुबारा पकड़ लिया था ।
इसी बीच सरितकान्त की देहगंध, छाया के नथुनों से टकराई तो उसके मन में अभी तक की सोई हुई स्त्री जाग सी गई थी और वह इस
क्षण में ही अपने आपको बदला हुआ पा रही थी। अचानक ही सही छाया पहली बार सरितकान्त के इतने पास आई थी कि एक बारगी
उसके दिल की धड़कन ही सुन ले ।
सरितकान्त और छाया अब सबके पीछे रह गए थे और खड़े - खड़े एक दूसरे की उपस्थिति की अनुभूति कर रहे थे ।
यह सरितकान्त और छाया की पहली मुलाकात थी जिसमें वह दोनों चुंबक के जैसे एक दूसरे की ओर खिंच रहे थे और ऊपर से शादी का
माहौल उनके मिलन को सार्थक कर रहा था ।
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