अनुभूति-1 [4(10)] छाया और रौनक के घर पहली बार सरितकान्त का आना

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इसी बीच रौनक, सरितकान्त को अपने घर किसी कारण से ले आए थे ।

दोनों दोस्त ड्राइंग रूम में बैठे बातचीत में लगे हुए थे, जिनकी आवाजें छाया और वृंदा को रसोई में भी सुनाई दे रही थीं, जहां वह

 लोग नाश्ता तैयार कर रहीं थीं।

सरितकान्त की आवाज सुनकर छाया सम्मोहित सी हुई जा रही थी; सरितकान्त बहुत ही बेतकल्लुफ़ी के साथ बातें कर रहे थे ।

उनका हर शब्द, उसके तन को आन्दोलित कर रहा था ।

हर शब्द की रवानगी में वह दीवानों की तरह मदहोश हुई जा रही थी ।

वह रसोई में जरूर काम कर रही थी पर मन से ड्राइंग रूम में सरितकान्त के हर शब्दों में तैरते हुए अपनी अलग ही दुनिया बना 

रही थी ।

वह एक अनोखा दिन था जिसने सरितकान्त को अंदर तक खोलकर रख दिया था ।

हालाँकि, जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ती गई, छाया और वृंदा को सरितकान्त की कभी असंगत और असंबद्ध होती बातचीत में 

असामान्य नज़र आने लगा था ।

ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने आकर्षक व्यवहार के पीछे कुछ छिपा रहे हों ।

भावावेश में उनकी बातचीत में कई अप्रत्याशित मोड़ आ रहे थे जिसमें सरितकान्त अपनी पत्नी कमलेश के साथ अपने रिश्ते 

के बारे में खुलकर बात कर रहे थे ।

उन्होंने खुलासा किया कि वह अपनी शादी के मुश्किल दौर से गुजर रहे थे।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट रूप से नहीं कहा लेकिन यह स्पष्ट था कि उनके और उनकी पत्नी के बीच नैसर्गिक रूप से समझ की 

कमी थी पर जाहिर तौर पर वह कह नहीं पा रहे थे ।

छाया और वृंदा ने पहली बार जाना कि सरितकान्त अपनी पत्नी कमलेश के साथ उतने सहज नहीं थे जितना कि एक पति को होना 

चाहिए।

ऐसा लग रहा था कि उन दोनों के बीच कहीं न कहीं अनकहा दर्द और अनसुलझे मुद्दे थे जो उनकी खुशी को प्रभावित कर रहे थे।

सरितकान्त के आकर्षक व्यक्तित्व और करिश्मा के बावजूद, छाया को एहसास हुआ कि हर किसी की अपनी लड़ाइयाँ और छिपे 

दर्द होते हैं ।

वह समझ गई थी कि ऐसे लोग ही ऐसे बोझ उठा सकते हैं जिनके बारे में दूसरों को कभी पता नहीं चल पाता।

सरितकान्त उनके घर काफी देर तक रुके थे और अपने जीवन की अनेक गुत्थियों को उजागर कर रहे थे ।

बहुत बड़ी निःश्वास और अनेक आशाएं लेकर उन्होनें रौनक से विदा लीं ।

छाया और वृंदा ने सरितकान्त की आहत भावनाओं को महसूस करते हुए, उनको लेकर अब तक जूझने के लिए बहुत प्रशंसा की थी ।

इस घटना ने छाया पर अमिट प्रभाव छोड़ा था ।

वह सरितकान्त की आभा की ओर आकर्षित होती जा रही थी ।

उनके शब्द उसके दिमाग में गूँजने लगे थे, जिससे वह खुद अपने जीवन और अपने रिश्तों पर विचार करने लगी थी।

वृंदा, सरितकान्त की इस स्वीकारोक्ति के बाद छाया पर पड़े प्रभाव के कारण उसके बदले व्यवहार पर अधिक ध्यान देने लगी थी ।

वृंदा और छाया को एहसास हो रहा था कि उसके आकर्षक व्यक्तित्व की सतह के नीचे, वह सिर्फ एक इंसान था, जो जीवन की 

जटिलताओं से जूझ रहा था।

सरितकान्त के साथ उनकी मुलाकात ने छाया और वृंदा को करुणा का मूल्य सिखा दिया था ।  

 

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