अनुभूति 1 [3(8)] छाया की अनुभूति -1
(8)
अब उस प्राइवेट फैमिली केबिन में छाया और सरितकान्त ही अकेले रह गए थे ।
सरितकान्त और छाया दोनों आमने-सामने बैठे थे और एक दूसरे को देखते ही जा रहे थे। उनके बीच में सांसें हीं थीं जो एक दूसरे
के बीच संवाद करतीं हुई चल रहीं थीं ।
छाया अपने आप में सरितकान्त की उष्णता से पिघलती जा रही थी, जिसे सरितकान्त अपनी आंखों को छाया की आंखों में डाले
मनचाहा आकार दे रहे थे ।
उनकी आंखों की गहराइयों भरी मनमोहक चितवन ने छाया के पूरे व्यक्तित्तव में उथल - पुथल मचा दी थी। छाया का मन उनकी
आँखों की अनकही गाथाओं को देख रही थी जो आंसुओं की शक्ल में उसकी आंखों में झिलमिलाने लगीं थीं ।
और यही झिलमिलाहट एक अदृश्य शक्ति बनकर स्वनिर्देशित छाया की ओर आते जा रहे थे और यही चुम्बकत्व उन्हें आज इतने
पास ले आया था जहां अनजाने ही वह छाया के हाथ को स्पर्श कर बैठे थे ।
इस स्पर्श ने छाया की रीढ़ में सिहरन पैदा कर दी थी जिससे उसकी रगों में अद्भुत विद्युतीय ऊर्जा प्रवाहित होने लगी थी।
उस प्रवाह से उसके शरीर के भीतर भावनाओं का सागर लहरा उठा था जो अब तक निष्प्राण पड़ी स्त्री चेतना को जागृत करने
लगा था, जिसका उसे स्वयं भी भान न था।
छाया, उनके हाथ की छूअन से अभिभूत हो गई थी और अपलक सरितकान्त को देखते हुए अपने अंदर की हलचल की अनुभूति कर
रही थी; यह हलचल उसे ऐसी जगह में लेकर जा रही थी जहाँ शब्द अनावश्यक हो गए थे ।
इस मौन आदान-प्रदान के बीच, छाया, अपने भीतर भावनाओं के बवंडर को रोकने में असमर्थ, अपने अस्तित्व की गहराइयों में
गोते लगाने लगी थी ।
उसके अपने अंदर की छिपी हुई नारी, जिसका उसे भान भी न था ........
खुद का एक ऐसा पहलू जिसके बारे में वह उस पल तक नहीं जानती थी......
प्रकृति की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना को अपने पास में ही रखी; अपने में ही भूली बैठी थी ........
चाहे जैसे भी हो सरितकान्त के बहाने से ही सही, उसे अपने आपको जानने की राह तो मिल गई........
.............जिससे, उसके भीतर छिपी हुई नारी उजागर हो रही थी ।
वह अपलक एक दूसरे को देखे ही जा रहे थे, पूरे वातावरण में एक अव्यक्त ऊर्जा बह रही थी जो दोनों को एक दूसरे में समाहित
करती जा रही थी जिससे वह चेतना युक्त जड़ से हो रहे थे -
प्रतिमा सदृश्य -
जो वितीति* से शाश्वत होते हुए प्रतीति में स्पंदित हो रहे थे -
इन्ही स्पंदनों से युक्त पवन भी कह रही थी –
"कभी-कभी, मौन से भी प्रगाढ़ संबंधों का प्रारंभ होता है......!!"
छाया, शब्दों से निरत, स्पर्श की मूक भाषा में सरितकान्त से संवाद कर रही थी ।
वह जान रही थी कि यह जुड़ाव दुर्लभ, अनमोल और अविस्मर्णीय है ।
वह इस पल को संजोकर रखना चाह रही थी।
आज वह अपने आपको जान पा रही थी कि उसके
पास भी एक शरीर है, एक मन है, मन में भावनाएं हैं और उनमें उमंगें भी हैं ।
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(· वितीति – बीता हुआ समय , भूतकाल )
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